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Wednesday, December 21, 2011

"सिसकते लम्हे"


न अब यहाँ रुकने का मन 
न किसी को रोकने का,
न किसी के आने का सबब
न अब किसी के जाने का, 
बस 
सारी रात, 
तन्हा, बरस जाने का मन 
घुप्प अंधेरो में,
अपनी ही परछाई से, 
सिसकते हुए लिपट जाने का मन 

NA AB YAHA RUKNE KA MAN 
NA KISI KO ROKNE KA 
NA KISI KE ANE KA SBAB
NA KISI KE JANE KA SBAB
BAS,
SARI RAT,
TANHA, BARAS JANE KA MAN 
GHUPP ANDHERO ME,
APNI HI PERCHAYI SE, 
SISAKTE HUE LIPAT JANE KA MAN  

Friday, December 9, 2011

मै इक बंधा ''शिकारा''



न तुम, मेरे करीब आ सकी 
न मै, तुमसे दूर जा सका 
उम्र बीतती रही ऐसे ही ख्यालो में 
 कभी तुम कुछ नहीं बोले 
 न कभी हमसे कुछ बोला  गया,

कभी तुम मुझसे छुपाते गए 
कभी मुझसे दिखावा न हुआ 
न जाने वो कैसा रास्ता था 
जिसपे कभी तुम नहीं चले 
और न कभी मुझसे अकेले आया गया 

 
तुम रहे इक आजाद पंछी 
मै इक बंधा ''शिकारा''
तुमने रुकना मुनासिब नहीं समझा 
 न कभी मुझसे तुम्हे रोका ही गया 

तुम्हे नए रिश्ते बनाने का शौक
हमे पुराने बंधन प्यारे 
तुमसे कभी बन्धनों में बंधा न गया 
और न हमसे नये साहिलों से  रिश्ता बनाया गया

Friday, November 25, 2011

****और लौ फिर बुझ गयी ****


खंडहर, 
मेरी यादों के
जहा बसते है मेरे,
सपने 
जो अब बचे है सिर्फ 
फड़फड़ाते  हुए ...
जिनके पंखो में 
अब नहीं  है 
उड़ने की शक्ति,
हो  गए  है 
निमित्त मात्र, 
फिर भी कभी -कभी   
करते है,
कोशिश 
आखिरी उड़ान  की 
शायद  उन्हें याद आ जाती है 
उसी बुझते हुए  दीपक की 
आखिरी लौ

देखकर लगन उसकी 
लगता है की अगले ही पल 
शायद पूरे हो जायेंगे 
सब सपने मेरे 

जो अब तक खंडहर में छुपे फिरते थे 
वो आ जायेंगे खुल के सबके सामने, 
फिर अगले ही पल 
पता चलता है की 
बस इतना ही तेल था 
जलाने को , दीपक में 
और लौ फिर बुझ गयी 

फिर से वही अँधेरा 
फिर से वही खंडहर
जहा मेरे सपने अब भी  है 
इसी आस में 
की शायद कोई आये , उन्हें पूरा करने *******

Thursday, November 3, 2011

"मंजिल की तलाश में"


मेरी  मंजिल!!
न ये जिंदगी है ....
न ये आसमां........, 
हर सुबह दौड़ता हूँ 
फिर भी मंजिल की तलाश में !!!!!!!!

कोई पुकारे मुझको,
मेरे अतीत से 
तो कोई सामने  से
मुझको आवाज दे , 
गंतव्य है मेरा कहाँ , नहीं जानता 
बस दौड़ता जाता हूँ ,  बेकस ,बेबस , बेसबब
मंजिल की तलाश में !!!!!!!!

मै बन गया हु,
इक रेल का डिब्बा,
है कौन सा स्टेशन , मेरा अंतिम पड़ाव 
नहीं जानता, 
रुकता हूँ कुछ घडी , कुछ पल 
फिर अगले ही पल 
आती है इक आवाज ssssssss
बदल देती है जो मेरी पहचान के मायने 
मै फिर दौड़ने लगता हूँ 
मंजिलो की तलाश में !!!!!!!

यहाँ है सबके अपने अपने उसूल
सबके अपने अपने दायरे 
कुछ घडी तो,
साथ चले हमसफ़र बनके 
फिर अगले ही स्टेशन पर
उतर पड़े अजनबी बनके, 
मै फिर दौड़ने लगता हूँ 
मंजिल की तलाश में !!!!!!!

                                             अमरेन्द्र शुक्ल 'अमर'

Wednesday, October 19, 2011

"तेरी महक क्यूँ नहीं जाती"

"इन नशीली फिजाओं से, तेरी महक क्यूँ नहीं  जाती 
बरसों से ये  टिमटिमाती लौ,अब क्यूँ बुझ नहीं जाती "

ए सनम! 
"मुझे भी दे पता, तू उन बेदर्द  रातो का 
जहाँ पर तुझे रहकर ,मेरी याद नहीं आती "

"मेरी जिंदगी सुलगती है ,हर पल  तेरी  जुस्तजू की खातिर 
 मुझे  इक बार में ही जलाने क्यूँ नहीं आती  "

"तुने मुझको भुलाया है ,या भूली है खुद को भी 
शायद तुझे... मेरी या अब खुद की आवाज ही नहीं आती "

"क्यूँ अपलक निहारती हो मुझको , दरवाजे की दरारों से 
पल भर के लिए ही सही,  तू इन दरारों को भरने क्यूँ नहीं आती "

"मेरी जिंदगी फ़ना है ... ,फ़ना है मेरी मौत भी तुझ पर 
तू इक बार में ही मुझको हराने क्यूँ नहीं आती "

Thursday, September 29, 2011

जिंदगी से कुछ पल उधार लिए




तेरी तस्वीर को दिल से लगाये बैठे है 
हम अपनी  ख्यालो की अलग दुनिया  बसाये बैठे है 
जिंदगी जो , अब तक व्यर्थ थी, मेरी
उसे तेरे लिए फागुन का मदमाता मौसम बनाये बैठे है 

महकी महकी सी साँसे मेरी 
तुमसे मिलने की है अभिलाषा मेरी 
अकेले ही चला था अमृत की तलाश में 
अब, तुझे पाने की आस में अपनी मृग तृषा बुझाये बैठे है 

दर्द की अंधी गली है , कोई भी न मोड़ है 
सभी स्वप्न टूटकर बिखरे है यहाँ, फिर भी 
हम तेरी खातिर उन गलियों से
रिश्ता निभाए बैठे है  

तेरी तस्वीर क्या मिली , मुझे यूँ लगा आइना मिल गया मुझको 
'सूरत-ए- अमर'  आईने में देखी नहीं कभी, तेरी तस्वीर को आईना बनाये बैठे है 

मिल गयी 'रौनक ए जहा' मुझको ,तेरे नाम से  
हम अपने नाम को तुझसे मिलाये बैठे  है 
बहारो ने भी लंगर डाल दिए, तेरे नाम से 
जो  झील के उस पार डेरा जमाये बैठे है 

मेरी हसरतो के तकाजो ने तेरे लिए, जिंदगी से कुछ पल उधार लिए 
हम अपनी हैसियत तो भूले ही थे , वो भी अब अपनी दुनिया भुलाये बैठे है 

Monday, August 29, 2011

"वो आना तो चाहती थी !"



उसने  छिपाया  तो बहुत 
पर छुपा  न  पायी  
चेहरे की लाली 
सुर्ख आँखों  से बहे  काजल  का पानी 
वो छिपा  न  पायी  


यु  तो भूली  
वो सारी  कहानी 
बस  दो  पल  कि कहानी  
दर्द में डूबी 
पूरी जिंदगानी भुला  न  पायी 



गयी तो थी 
रात के  घोर अन्धियारें  में 
घर की चार दिवारी लाँघ  कर 
नहीं  पता  था उसे 
कि वो जिसे  लाँघ  कर जा  रही  है  
वो चार दिवारी उसके  घर  की नहीं  
उसके  माँ- बाप  की जीवन  रेखा  है  


किसी के  प्यार  में 
बन्द हो गयी  थी आँखे  
उसकी  
या ,  
खुल  गया  था समाज  का  मुहं 
उसके  लिए  
इन सब से वो अनजान थी 

वो तो बस  जाना  
चाहती थी 
ये सारे  बंधन  तोड़  कर 
किसी ओर  से जोड़ने  के  लिए  


वो चली भी गयी 
छोड़  गयी  
अपने  पीछे  
बहुत कुछ अनकही सी कहानियाँ 

दो  दिन  भी  न  सह  सके  
ये वज्रघात 
उसके  माँ  बाप ....................


बेचारी क्या करती 
वो आना तो चाहती थी 
वापस वही 
जहाँ से चार दिवारी ,
लांघ कर गयी थी
उस काली रात 

पर उसे अहसास हो चला था 
कि रात के सन्नाटे में चार दिवारी लांघना 
आसान  है     
पर 
दिन   के   उजाले   में,
सब   के   सामने , 
अपने  ही घर   के   दरवाजे  से 
भीतर  आना बहुत  मुश्किल  है   

                                       अमरेन्द्र 'अमर' 

Friday, August 12, 2011

तेरा- मेरा प्यार



मेरे दिल कि हसरतो का
'गुबार' अभी बाकी है 
रुक जा ओ  मेरे यार
तेरा- मेरा प्यार अभी बाकी है 

दो घडी को तो ठहर 
अभी 'इबादत ए रात' बाकी है 
रोज मिलते है बेगानी राहों में 
अभी 'तेरा मेरा साथ' बाकी है 

तेरा आना,
यु बिन श्रृंगार 
य़े बात अभी बाकी है 
इजहारे -ए-मोहब्बत का 
वो लम्हा- ए-सुहानात अभी बाकी है 

होकर मेरे, गैरों से मिलना 
य़े कैसी  आदत है तेरी 
बेवजह तो नहीं, 
तेरा सज धज के निकलना 
गैरों के लिए 
य़े किस्सा-ए-ख्यालात  अभी बाकी है 

मेरी आँखों से बरसना 
रुक रुक के तेरा 
कैसे मुमकिन है य़े 
जबकि मेरे लबो पे तेरा नाम अभी बाकी है 
रुक जा ओ  मेरे यार
तेरा- मेरा प्यार अभी बाकी है 

रुसवाई ही सही, तेरी,
मेरे लिए, 
कुछ तो है 
तेरे  मेरे दरम्यान       
इसी  इक  रिश्ते  का मज्मात  अभी  बाकी  है 
रुक जा ओ  मेरे यार
तेरा- मेरा प्यार अभी बाकी है 
                                 
                                            अमरेन्द्र 'अमर' 

Saturday, August 6, 2011

ये अधूरी जिंदगी



मेरी अधूरी जिंदगी  
जो मेरे मन की टूटी हुई खिड़कियों  के
सीखचों से बाहर झाकती, 
आजाद हो जाने को
कही दूर चले जाने को , 
जिसे कैद कर रखा हैं  
मैंने अपने ही अंदर 
घुप्प अंधेरो में,  
जहाँ घुट रही है 
अंदर ही अंदर ,
बेहद निरास, बेहद हतास 
मेरी जिंदगी,

मै करवटे तो बदल  रहा हूँ 
पर खुद की  
जद्दोजहद की,  
जो खुद अपने आप से हैं
जहा लड़ रही है
मेरी जिंदगी ; 
कभी न बदलने वाले उसूलो से 

यहाँ बर्फीली तेज हवाये 
जला रही है मुझे 
दावानल के जैसे, 
जबकी  मेरी जिंदगी 
झांक रही है, छटपटा रही है
मेरे मन की टूटी हुई खिडकियों के सीखचों से बाहर
कही दूर जाने के लिए, 
मेरी जिंदगी 


जी रहा हूँ फिर भी 
मै ये अधूरी जिंदगी 

                               अमरेन्द्र ' अमर '

Thursday, July 28, 2011

इक बूँद

















दूर  ही  सही 
फिर भी, 
मेरे अपने  से लगते हो 
दूर  बादल  में,
छुपी इक बूँद जैसे   

बरसेगा सावन 
तो मेरे घर भी बरसेगा 
मेरे मन कि दिवारों  को 
भिगोते हुए  से 

दरार सी आ गयी है 
मेरे दर-ओ-दीवार में , 
तू बरसेगा कितना भी,
चुपके चुपके
रिस रिस के 
वो एक बूँद
पहुच ही जाएगी 
भिगोने के लिए 


कब से रेतीले रेगिस्तान में खड़े है 
ठूठ के जैसे 
बरसों तो शायद ,
कुछ फूल खिल जाये मेरी अभिलाषाओ के 

तू  कब का बरस गया होता 
जो हमसे दूर न गया होता 
एक हम है जो दूर तो हो गए 
बरसा न गया हमसे 

इस तन्हाई -ए- आलम में 
साथ रहा है मेरे 
तो वो है मेरी तन्हाई 
उसकी तन्हाई ने तो कब का 
भिगो दिया होता 

वो दूर से ही कहता रहा 
अपना ख्याल रखना 
मैंने भी  रखा 
वैसे ही 
जैसे 
सागर किनारे 
नन्हे करतलो  से बने  
रेत के छोटे छोटे महलो ने रखा ,
जो लहर आने का इन्तेजार तो करते है 
पर उनके जाने के बाद 
उन महलो का निशा तक नहीं होता 
वो आत्मसात हो जाते है उन्ही के साथ
उन्ही के संग 
अपने वजूद को मिटा के 

दूर  ही  सही 
फिर भी, 
मेरे अपने  से लगते हो 
दूर  बादल  में,
छुपी इक बूँद जैसे   


Thursday, July 21, 2011

चैन आ जाये



बहुत  दिन  बीते  ख्वाबो में मिले 
अब हकीकत  में आ जाओ तो चैन आ जाये

नजरे मेरी, कब से तुझे आईने में निहारे 
अब खुद मुख़ातिब हो जाओ तो चैन आ जाये

कब के टूटे अरमान मेरे, जुड़ते ही नहीं 
खुद टूट के  आ जाओ तो चैन आ जाये

मुहाने खड़े रहे समुंदर के, तो क्या हासिल 
तुम बूँद बन के आओ तो चैन आ जाये 

जैसे गीत गया हो पत्थरों ने, खुदा बनके 
ऐसे ही कोई गीत सुना जाओ तो चैन आ जाये 

मै पर्दा नशीं हो जाऊ, इस दुनियां जहाँ से  
ऐसे कभी पर्दा हटाओ तो  चैन आ जाये 

अरसा गुजर गया चाँद की चांदनी देखे
खुद चांद बन के आओ तो चैन आ जाये 

Thursday, June 30, 2011

तुमसा बागबां



वो लबो पे मेरा नाम जो लाते   
तो हम दौड़े चले आते थे ,
आज हमने पुकारा  
तो वो कहते है 
तुम्हारे दामन में कई कांटे है 
मैंने  कहा
जिसे मिल जाये, तुमसा बागबां
उसके दामन में कांटे भी फूल बन जाते है 

ये नसीब मेरा है जो कांटे है मेरे दामन में 
फूल होते तो कब का टूट गए होते 

बड़ी शिद्दत से सींचा है 
इनको मैंने 
खुशियों कि चाह में 
ये बने है फूल 
आज तुम्हारी राह में

फूल तो बहुत तोड़े होंगे तुमने  
कभी कांटे भी तोड़ के देखो 
यूँ तो फूलो कि कोमलता से भी 
तुम सहम गयी होगी
आज काँटों की  नर्मी भी देखो 

झुक रही थी वादियाँ कल तक इशारो पे मेरे 
आज पलके भी झुकती नहीं    
कल तक साथ थे, मेरे साये की तरह 
आज परछाई भी बनते नहीं 

कल तक मेरे दामन में  उनके प्यार की बारिश थी 
आज तन्हाई के  बादल है जो बरसते नहीं..........

Thursday, June 23, 2011

पिये जा, जिये जा



पिये  जा, जिये  जा ,
उसके अश्को को ही सही   
पर तू पिये जा जिये जा 
कल तक कमी थी 
आज पूरी हो जाएगी 
तेरे साथ न सही 
संग यादो में दौड़ी चली आएगी 

यहाँ मय भी है 
मीना भी है 
यादों में उसकी 
जीना भी है 

उतार इक घूंट, 
उसकी यादों का
तू हलक के नीचे  
यहाँ नशेमन भी है
और नशा -ए-यार भी 

रख सामने साकी, 
तू देख तो जरा 
नशा किस्मे है 
यहाँ तेरा हमदर्द (मय)  भी हैं
और तेरा यार भी 

पैमाने टूटते है 
तो टूट जाने  दो
आज हौसला रखो अपने हौसले का  
देख वफ़ा  किस्मे है 
आज वो भी है 
और उनकी यादे भी 

Thursday, April 21, 2011

तुम भी चले आना'



जब तक 
तुम्हारी  खुशिया तुम्हारे साथ है 
तुम कही भी रहों, 
पर जब भी तुम उदास होना
आँखों में बारिश का अहसास होना  
चाहो तुम किसी अपने के,
काँधे पे सर रख कर रोना 
तब बिन बताये 
बिन बुलाये 
चले आना 
मै इन्तेजार करूँगा तुम्हारा 
मै भी साथ दूंगा तुम्हारा 
अभी मुझ पे तुम्हारा एहसान बाकी  है 

मै बहुत रोया था उस रात 
जो तुमने सहारा दिया था, 
अपने आँचल का 
"बहुत भीगा था उस रात 
वो आँचल तुम्हारा,
उसकी वो नमी अब भी तेरे रुखसार पे है,"

तब से अब तक न रो सका हूँ मै
जब कि आँसू-ए- समुन्दर अपने सबाब पे है 
चले आना इसी बहाने, 
क्या पता ये बाँध कब टूट जाये  
और इस सैलाब में,
मै बह जाऊ,
इससे पहले तुम चले आना 
इसे बहाने......... 
 
जब भी आना बिन बताये'
बिन बुलाये;
बुलाया तो गैरों को जाता है 
अपने तो बस चले आते है ,
अपनों से मिलने 
तुम भी चले  आना'

Thursday, March 24, 2011

अंतिम क्षण


  
चारो तरफ फैली है यादें तेरी
फिर भी यादें कम है 
दर्द पहले से ज्यादा हुआ है, 
फिर भी दर्द कम है .....

सपने है आँखों में जागे जागे 
और आज आँखों में नींद कम ,है 
यूँ  तो जी रहे है हम जिंदगी से ज्यादा 
फिर भी लगता है ये जिंदगी कम है..... 


यु तो देखे है हमने, जीवन के 
सब रंग,
फिर भी ये तेरे रंग से रंगी कम है ......
मै अब  कही  भूल  न  जाऊ ,
तुम्हे, भूल जाने के बाद,
अब इक यही गम है 

आ जाओ मेरी रूह-ए- तमन्ना 
कि तुमसे मिलें जमाना बीत गया, 
यादें है तेरी, मेरी साँसों में बसी,
पर लगता है शायद अब मेरी साँसे कम है 
आ जाओ मेरी रूह-ए- तमन्ना !!!!  ...........


Thursday, February 24, 2011

आने वाली शाम



ये दिन भी बड़े अजीब  हैं 
जब शाम ढले तुम पास आते हों 
दोपहर अपनी सुनहरी चादर समेटता
शाम फैलाती अपनी ठंडी-ठंडी बाहें

रात की रागिनी करती हमारा इन्तजार 
अपनी पनाहों में लेने को 
चाँद भी चांदनी को भेजता ज़मी पर
हमे अपनी भीनी भीनी रौशनी में जगमगाने को 

ये तारे भी 
हमे अपने होने का अहसास दिलाते 
देख कर हमारे मिलन की बेला 
कही दूर गगन में टूट से जाते

तारो से बिछड़ने का गम 
चाँद भी न सह पता
मुझे तेरे आँचल में देखकर 
चंद पलो में रात को लेकर चला जाता 

और कब हमारे मिलन की ऋतु बीत जाती  
ये हम जान भी न पाते 
हम फिरआने वाली शाम का इंतजार करते, 

ये दिन भी बड़े अजीब  हैं 
जब शाम ढले तुम पास आते हों 

Thursday, February 3, 2011

"गुनाहगार"

फांसले  भी मिट गए 
दूरियां भी न रही,
वो लकीर ही न मिटी 
जो तुम खींच के गए,

पास भी आते गए 
दूर भी जाते गए , 
नजदीकियां भी रही, दरमियाँ
और वो दूरियां भी बढ़ाते गए,

हम सहरा - ए - मुहब्बत में ,
कुछ ऐसे उतरते  गए,
सरे बाज़ार रुसवा हुए
मोहब्बत - ए - झील में 
और वो खड़े देखते गए ,
 
"इस फरेबी दुनिया में ऐसा कई बार हुआ , 
गुनाहगार कोई और था, गुनाहगार कोई और हुआ "

Thursday, January 13, 2011

"मेरे जीवन साथी"


हों तुम क्या मेरे लिए 
कैसे बताऊँ, 
मै तुमसे अब कैसे छुपाऊ
कुछ मैं आधा  अधुरा  हूँ  
कुछ तुम पूरी - पूरी है,
फिर मै कैसे कहू की 
ये तुम हो !
ये मै हूँ !
जब की हम एक है 

गिर रही है बिजली
सागर में दूर कही,
उठ रही है तरंगे
मेरे मन में यहीं कही,
छा रहा है आँखों में नशा
तेरे खुमार का, 
फिर मै  कैसे कह दूँ 
ये तुम हो !
ये मै हूँ !
जब की हम एक है 

तुम बदले तो क्या बदले
पर्वतों  के  भी रंग
बदल गए,
पंछी ठहरे रात को 
और दिन में मचल गए,
फिर मै कैसे कह दूँ  की 
ये तुम हो
ये मै हूँ 
जब की हम एक है 

गंगा -जल  
मैला नहीं है आज भी, 
न जाने कितनो ने,
इसमें डुबकी लगायी
वो तो तारनहार  है,
तारेगी,  
मेरे इस जीवन को ,
तुम तो सदियों से मेरी हों
जन्मो - जन्मो को तारोगी  
फिर मै कैसे कह दूँ 
की ये तुम हो 
यें में हूँ
जब की हम एक है 

"मेरे जीवन साथी"