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Monday, April 2, 2012

"नगर वधु"


१-
नहीं आसरा,
मंजिल का अब, 
न किसी पड़ाव की जरुरत है मुझे 
जो भी रुका, मंजिल बना 
जो चला गया 
वो कुछ पल का रहबर बना 

२-
न मेरी कोई डगर है 
न मेरा कोई नगर है यहाँ 
जिस राह भी तुम ले चलो 
वो ही डगर अपनी 
जिस नगर  में तुम रुको 
वो ही नगर अपना है यहाँ 

३-
न यहाँ की  बस्ती मेरी 
न यहाँ के लोग मेरे 
जिसने जहाँ भी रखा मुझे 
उसी का घर मेरा घर बना 

"ऐ समाज के पुरोधा 
अब तुम ही बताओ, 
मै क्या हूँ ????"

अमर*****     
नगर वधु- तवायफ़ 

86 comments:

  1. Replies
    1. Shukriya संगीता स्वरुप ( गीत ) ji......
      aapka sneh hi hame kuch kerne ko utasahit kerta hai

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  2. बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति।

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  3. संवेदनशील अभिव्यक्ति।

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  4. नगर-वधू की यही दर्द भरी कहानी है!...बहुत सुन्दर प्रस्तुति!

    मेरे उपन्यास 'कोकिला...' के बारे में अपनी राय जरुर दें...अभी शुरुआत है...
    लिंक...
    http://arunakapoor.blogspot.in/

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  5. बहुत ही भावपूर्ण शब्दों में नगरवधू के दर्द को उकेरा है.

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  6. बहुत सुन्दर...
    अपने अस्तित्व को तलाशती है वो......

    सादर

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  7. बहुत सुन्दर रचना!
    आप भी तो हमारे ब्लॉग पर पधारा करें।

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  8. "ऐ समाज के पुरोधा
    अब तुम ही बताओ,
    मै क्या हूँ ????"...man kii bedna chhalak padi
    bahut sundar

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    Replies
    1. Shukriya Mamta ji, aapka aana accha lga .aabhar

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  9. नगर वधु के दर्द को जिया है आपने इन पंक्तियों में ...

    ReplyDelete
  10. bahut samvedna samete hui hai yeh rachna nagar vadhu jiski koi paribhasha hi nahi hai koi astitv hi nahi.

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  11. बहुत बढ़िया संवेदन शील रचना,सुंदर अभिव्यक्ति,...अमरेन्द्र जी

    MY RECENT POST...काव्यान्जलि ...: मै तेरा घर बसाने आई हूँ...

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    Replies
    1. dherrendra ji shukriya.aapka aane se hamare gher me raunak bad jati hai .sadar

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  12. http://bulletinofblog.blogspot.in/2012/04/blog-post.html

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  13. क्या है पहचान मेरी ?
    संबोधन क्या है मेरे लिए ?
    रिश्ता ? क्या है ?

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  14. अस्तित्व की तलाश में नारी का दर्द
    बहुत ही संवेदनशील रचना.....

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  15. "ऐ समाज के पुरोधा
    अब तुम ही बताओ,
    मै क्या हूँ ????"very touching...

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  16. बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति

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  17. नगर वधू की वस्तुस्थिति की सटीक प्रस्तुति...

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  18. एक और अच्छी प्रस्तुति |
    ध्यान दिलाती पोस्ट |
    सुन्दर प्रस्तुति...बधाई
    दिनेश पारीक
    मेरी एक नई मेरा बचपन
    http://vangaydinesh.blogspot.in/
    http://dineshpareek19.blogspot.in/

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  19. मार्मिक सटीक रचना..

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  20. "ऐ समाज के पुरोधा
    अब तुम ही बताओ,
    मै क्या हूँ ????"
    बहुत खूब पंक्तियाँ अमरेन्द्र शुक्ल जी ! बहुत भावुक , बहुत कुछ कहती कविता ! बधाई

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  21. बहता जल कहाँ कभी किसी उपाधि में बँधा है।

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  22. सबकी अपनी अपनी मजबूरी है.
    सुन्दर भावमय प्रस्तुति.

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  23. जिसने जहाँ भी रखा मुझे
    उसी का घर मेरा घर बना
    सुंदर मार्मिक शब्दावली प्रेरणादायक कविता ....रचना के लिए बधाई स्वीकारें.

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    Replies
    1. Shukriya Sanjay ji .....bahut dinoke baad aapka yaha aana accha laga **********

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  24. नगर वधु का अपने आप में दर्द समेटे हुए .....बहुत खूब


    आहें टीसें हैं रंजो गम ,हो हैं सीने में
    कोई बतलाए इन्हें पाल के ,रखूं कब तक ||......अनु

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  25. न मेरी कोई डगर है
    न मेरा कोई नगर है यहाँ
    जिस राह भी तुम ले चलो
    वो ही डगर अपनी
    जिस नगर में तुम रुको
    वो ही नगर अपना है यहाँ
    -------नगर-वधू का फ़िर अर्थ क्या हुआ? उसका सिर्फ़ एक ही नगर होता है..
    -----क्या वास्तव में नगर-वधू तवायफ़ को कहते हैं ?..शायद नहीं....... प्रसिद्ध उपन्यास "वैशाली की नगर वधू" को पढें ...फ़िर अपनी कविता व राय ज़ाहिर करें...

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    Replies
    1. Dr. Shyam Gupta ji, aapka bahut bahut aabhar.jo aap yaha tak aayen, aapki bahumulya Ray ke liye aabhar..................

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  26. बहुत संवेदनशील रचना,बहुत ही सुंदर प्रस्तुति
    आप को सुगना फाऊंडेशन मेघलासिया,"राजपुरोहित समाज" आज का आगरा और एक्टिवे लाइफ
    ,एक ब्लॉग सबका ब्लॉग परिवार की तरफ से सभी को भगवन महावीर जयंती, भगवन हनुमान जयंती और गुड फ्राइडे के पावन पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं ॥
    आपका

    सवाई सिंह{आगरा }

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  27. समर्पण की सहज अभिव्यक्ति।
    सुन्दर रचना।
    धन्यवाद।

    आनन्द विश्वास।

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  28. अब बताइये इसमें समर्पण की अभिव्यक्ति कहां से आगयी....यह तो तवायफ़ के दर्द की दास्तां है....

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    1. aapka kehna bikul sahi hai.......mai abhi sikh rha hun so galti ho gyi hai, aapse kshama chahta hu aage se aapki kasauti pe kahara uterne ki kosis kerunga...sadar

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  29. Aapka kahna bilkul sahi hai..... Seekh bhi mili.

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  30. बहुत ही मार्मिक रचना ....एक नगर वधु के अन्तःस की !

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  31. waah ! bahot khoob. sundar srajan abhivyakti ke liye badhayi .

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  32. बहुत ही बेहतरीन और प्रशंसनीय प्रस्तुति....


    इंडिया दर्पण
    की ओर से शुभकामनाएँ।

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  33. मन को उद्वेलित करने वाली रचना...

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  34. ब्लॉग का नया आमुख बहुत सुन्दर है...

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  35. बहुत मर्मस्पर्शी रचना....

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  36. पहली बार देखा ब्लॉग! अब पढूँगा पोस्ट-दर पोस्ट!

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