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Thursday, July 28, 2011

इक बूँद

















दूर  ही  सही 
फिर भी, 
मेरे अपने  से लगते हो 
दूर  बादल  में,
छुपी इक बूँद जैसे   

बरसेगा सावन 
तो मेरे घर भी बरसेगा 
मेरे मन कि दिवारों  को 
भिगोते हुए  से 

दरार सी आ गयी है 
मेरे दर-ओ-दीवार में , 
तू बरसेगा कितना भी,
चुपके चुपके
रिस रिस के 
वो एक बूँद
पहुच ही जाएगी 
भिगोने के लिए 


कब से रेतीले रेगिस्तान में खड़े है 
ठूठ के जैसे 
बरसों तो शायद ,
कुछ फूल खिल जाये मेरी अभिलाषाओ के 

तू  कब का बरस गया होता 
जो हमसे दूर न गया होता 
एक हम है जो दूर तो हो गए 
बरसा न गया हमसे 

इस तन्हाई -ए- आलम में 
साथ रहा है मेरे 
तो वो है मेरी तन्हाई 
उसकी तन्हाई ने तो कब का 
भिगो दिया होता 

वो दूर से ही कहता रहा 
अपना ख्याल रखना 
मैंने भी  रखा 
वैसे ही 
जैसे 
सागर किनारे 
नन्हे करतलो  से बने  
रेत के छोटे छोटे महलो ने रखा ,
जो लहर आने का इन्तेजार तो करते है 
पर उनके जाने के बाद 
उन महलो का निशा तक नहीं होता 
वो आत्मसात हो जाते है उन्ही के साथ
उन्ही के संग 
अपने वजूद को मिटा के 

दूर  ही  सही 
फिर भी, 
मेरे अपने  से लगते हो 
दूर  बादल  में,
छुपी इक बूँद जैसे