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Friday, November 26, 2010

फरेबी


"अंधेरो  में  
रास्ते  दिखते  है यहाँ,  
दिन  के  उजाले  करते  है  
बगावत,  
रातो  को 
जुगनू  अपनी  चमक  
बिखेरता  है,  
सुबह  का  सूरज  
घना  अँधेरा  है  "

"जहा तक  भी  देखूँ
कुछ  दिखता  नहीं ,
बंद  कर  लू  
जो  आँखे  
तो फिर वही  तेरा
फरेबी  चेहरा  है "

"राहों में आकर तेरी 
राहों में नहीं थे ,
इक तुम थे  
जो मेरे मन मंदिर में होकर भी,
मेरे नहीं थे "

Sunday, November 14, 2010

तेरा आना


जी  लेने  दो  इस  इक  सांस  में  
वो  सारे   पल  मुझको  
सदियों  जिस  पल  के  लिए  
साँसों  का  गला घोटता आया  हूँ  में  

अब आ गए हो जो 
साथ मेरे चलने को 
तो मंजिल भी मिल जाएगी 
तुम दो कदम चलो तो सही 
संग खुशिया भी आएँगी 

Monday, November 1, 2010

दुनिया के रंग


मै दुनिया के हसीन रंगों में, 
अपनी खुशी का रंग ढूँढता  रहा ,
कुछ तो जाने जाने पहचाने मिले ,
बाकियों का वजूद ढूँढता  रहा ,

जिस रंग को सब मिल रहे थे 
सब अपने चेहरे पे मढ़ रहे थे 
मैंने भी सबकी देखा देखी,
उस रंग  को चुन लिया ,

कोशिश की चढाने की,
उन्हें अपने रंग पे, 
कुछ तो चढ़ा  मेरे हिसाब  से,
कुछ अपने रंग में चढ़ गया, 

कुछ दिन तो चमकता रहा, 
फिर वो भी हसने लगे ,
मुझे मेरी वही सूरत 
फिर से दिखाने लगे,
 
दो दिन में ही उसने अपना रंग ,
दिखा दिया, 
मै जैसा था वैसा ही मुझको,
बना दिया, 

"ये सारें रंग,
चढ़ के भी मुझपे, 
बेरंग नजर आते है, 
ये दुनिया के रंग है,
जो दो पल में उतर जाते है,..............."

"सदियाँ गुजर गयी वो रंग नहीं उतरा, 
जहाँ पे सर रख कर वो  इक बार जो रोया था "

अमरेन्द्र "अक्स"

आखिरी सफ़र


सो जाने दो,
मुझे मेरे बिस्तर पे आज  ,
कई सदियों  से ,
सोया नहीं हूँ,
उन बाँहों  की आस में...............

बिस्तर  पे मेरे  ,
टाट का पैबंद है,
तो क्या हुआ, 
नींद फिर भी चैन की आएगी मुझको, 
सदियों से उसके अह्सांस ने, 
सोने नहीं दिया...............