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Monday, April 15, 2013

मैं अपनी ही लेखनी बन जाऊ



तुम्हारा ही कहना है
उजालो से डर लगता है
फिर तुम ही कहो
कैसे न मैं रात बन जाऊ !

बिखर जाऊ मैं शबनमी बूंदों सा
ये चाहत है गर तुम्हारी
फिर तुम ही कहो
कैसे न मैं पिघल पिघल जाऊ

टूट कर चाहू तुम्हे
चाहे जैसे धरती को रात रानी
फिर तुम ही कहो
कैसे न मैं टूट - टूट  जाऊ

साथ चल सकू हर पल तुम्हारे
गर यही चाहत हैं तुम्हारी
फिर तुम ही कहो
क्यूँ न मैं तुम्हारा साया बन जाऊं

तुम चाहते हो मैं कुछ न कहू तुमसे कभी
जैसे हो हर शब्द मेरा गूंगा
फिर तुम ही कहो
क्यों न मैं अपनी ही लेखनी बन जाऊ

बीते  मेरे , हर दिन, हर पल
तुम्हारी ही पनाहों में
फिर तुम ही कहो
कैसे न मैं तुम्हारी बाँहों में झूल झूल जाऊ

अमर====