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Monday, April 2, 2012

"नगर वधु"


१-
नहीं आसरा,
मंजिल का अब, 
न किसी पड़ाव की जरुरत है मुझे 
जो भी रुका, मंजिल बना 
जो चला गया 
वो कुछ पल का रहबर बना 

२-
न मेरी कोई डगर है 
न मेरा कोई नगर है यहाँ 
जिस राह भी तुम ले चलो 
वो ही डगर अपनी 
जिस नगर  में तुम रुको 
वो ही नगर अपना है यहाँ 

३-
न यहाँ की  बस्ती मेरी 
न यहाँ के लोग मेरे 
जिसने जहाँ भी रखा मुझे 
उसी का घर मेरा घर बना 

"ऐ समाज के पुरोधा 
अब तुम ही बताओ, 
मै क्या हूँ ????"

अमर*****     
नगर वधु- तवायफ़