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Wednesday, October 19, 2011

"तेरी महक क्यूँ नहीं जाती"

"इन नशीली फिजाओं से, तेरी महक क्यूँ नहीं  जाती 
बरसों से ये  टिमटिमाती लौ,अब क्यूँ बुझ नहीं जाती "

ए सनम! 
"मुझे भी दे पता, तू उन बेदर्द  रातो का 
जहाँ पर तुझे रहकर ,मेरी याद नहीं आती "

"मेरी जिंदगी सुलगती है ,हर पल  तेरी  जुस्तजू की खातिर 
 मुझे  इक बार में ही जलाने क्यूँ नहीं आती  "

"तुने मुझको भुलाया है ,या भूली है खुद को भी 
शायद तुझे... मेरी या अब खुद की आवाज ही नहीं आती "

"क्यूँ अपलक निहारती हो मुझको , दरवाजे की दरारों से 
पल भर के लिए ही सही,  तू इन दरारों को भरने क्यूँ नहीं आती "

"मेरी जिंदगी फ़ना है ... ,फ़ना है मेरी मौत भी तुझ पर 
तू इक बार में ही मुझको हराने क्यूँ नहीं आती "