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Monday, February 27, 2012

"कुछ ख्वाब- कुछ मंजिले"



कल रात
लिखते लिखते 
आँख लग गयी
ख्वाब आ गये ,
जो चुभने  से लगे
मेरी ही आँखों में,
ये कैसे ख्वाब
जो मेरे होकर मुझे ही चुभे ******

कही  दूर, कही पास  
बहुत दौड़ भाग 
मंजिल पाने को 
मिल भी गयी 
वो खुश भी बहुत हुआ 

पर ये क्या 
मै भी तो साथ था 
बहुत दौड़ा 
उसके पीछे पीछे 
जिसने मंजिल को पाना चाहा
पर मेरी मंजिल कहाँ....... 

ये कैसे ख्वाब 
ये कैसी मंजिले 
जो  मेरे होकर भी 
मेरे नहीं ******

Friday, February 17, 2012

मेरा शहर



मदमस्त हवाओ से भरा 
ये मेरा शहर 
आज मेरे लिए ही बेगाना क्यू है 
हर तरफ
महकते फूल, चहकते पंक्षी 
फिर मुझे ही 
झुक जाना  क्यू है 

आज फिर इक चुप्पी सी साधी है 
इन हवाओ ने,
मेरे लिए
नहीं तो कोई,
दूर फिजाओ में जाता क्यू है 

छुपा रहा है
हमसे कोई राज, ये पवन 
नहीं तो और भी है,
इसकी राहों में 
ये इक हमी को तपाता क्यू है 

आज बड़ा खुदगर्ज, बड़ा मगरूर
सा लगता है ये मेरा शहर 
शायद इसकी मुलाकात हुई है  'उनसे'
नहीं तो ये हमी को जलाता क्यू है 

'अमर' जरूर,  रसूख 
कुछ कम हुआ है शायद  
वरना ये अपना हुनर 
हमी पे  दिखाता क्यू है 

Wednesday, February 1, 2012

"सीलती यादें "


मै  हूँ  
सृष्टि  की  एक  
अद्भुत  विडंबना 
शायद इसीलिए 
जो  भी  गुजरा पास  से  
कुछ  खरोचें  ही  दे  गया  
दामन  में  मेरे  
जो सदियों सीलती रही 
भिगोती  रही  मेरी  अंतर्रात्मा  को       

पता  नहीं  
तुमने   मेरी  
खोखली  होती  जड़े  
देखी  या  नहीं , 
मेरी  साखो  पे  बने  वो  घोसले  
जो  कभी  आबाद  थे पंक्षियों की  चहचहाहट   से  
उनकी  वीरानिया तुमने समझी  या  नहीं,  

तुम भी आकर बैठे 
औरों की तरह मेरी छाँव में 
कुछ  कंकड़  भी  उछाले, मेरी ओर तुमने   
अपनी  बेचैनी  को  दूर  करने  को.........  
तुम्हे  तो  बस 
कुछ  पल  गुजारने थे................   
मेरे दामन में 
जो  गुजार  दिए  तुमने 
दे  गए  तो  बस  
उलटे कदमो  के  निशान  जाते  जाते  

सब  मुसाफिर ही थे 
ये जानकर भी मैंने किसी को मुसाफिर न समझा 
और कोई ठहरा भी नहीं 
यहाँ मेरा 
 
हमराह बनके