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Friday, November 25, 2011

****और लौ फिर बुझ गयी ****


खंडहर, 
मेरी यादों के
जहा बसते है मेरे,
सपने 
जो अब बचे है सिर्फ 
फड़फड़ाते  हुए ...
जिनके पंखो में 
अब नहीं  है 
उड़ने की शक्ति,
हो  गए  है 
निमित्त मात्र, 
फिर भी कभी -कभी   
करते है,
कोशिश 
आखिरी उड़ान  की 
शायद  उन्हें याद आ जाती है 
उसी बुझते हुए  दीपक की 
आखिरी लौ

देखकर लगन उसकी 
लगता है की अगले ही पल 
शायद पूरे हो जायेंगे 
सब सपने मेरे 

जो अब तक खंडहर में छुपे फिरते थे 
वो आ जायेंगे खुल के सबके सामने, 
फिर अगले ही पल 
पता चलता है की 
बस इतना ही तेल था 
जलाने को , दीपक में 
और लौ फिर बुझ गयी 

फिर से वही अँधेरा 
फिर से वही खंडहर
जहा मेरे सपने अब भी  है 
इसी आस में 
की शायद कोई आये , उन्हें पूरा करने *******