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Thursday, January 17, 2013

“तिलिस्म”





“मीलों लम्बे सफ़र
             मीलो लम्बे कारवां,
तलाशते जिंदगी
अनाड़ियों की तरह”

“पंखो की थकान
मन का भटकाव,
एक अंतहीन सफ़र
पानी के बुलबुलों की तरह”

“तेज बहती धारा
मंद –मंद बहती हवा,
सोते हुए लोग
भागते तेज बदलो की तरह”

“पैगाम एक दुसरे का
एक-दुसरे की जुबान पर,
अस्थिर जीवन फीकी रौशनी
यहाँ सब कुछ एक तिलिस्म की तरह”

अमर ====


Tuesday, January 15, 2013

प्रेम की मौन भाषा


"एक तुम्हारे, 
न 
कह देने भर से तो सब ख़त्म नहीं हो जाता 
एक तुम ही तो नहीं 
जिसने रिश्तों को जिया 
मैंने भी तो ,
तुम्हारे हर सुख-दुःख में,
तुम्हारा साथ दिया,
स्थितियां कैसी भी रही हों ,
कभी उफ़ तक न की,
तुम्हारे साथ बराबर की भागीदार बनी रही
हाँ सच सुना तुमने
"बराबर की भागीदार"
आज बराबरी की बात कह दी,
तो तुम इतना आँख भौं सिकोड़ रहे हो
तब तो कोई ऐतराज न था तुम्हे
जब मंत्र पढ़े गए थे हमारे दरमियाँ
तब तो हमने-तुमने मिलकर कसमें खायी थी
कैसी भी परिस्थति हो
रिश्तों को हम मिल जुलकर निभाएंगे
हम मिलकर सामना करेंगे
फिर आज ऐसा क्या हुआ,
जो तुम दूर जाने को विवश हो गए
शायद
तुम हार गए हों ?
उकता गए हो, मुझसे
या तुम्हारी पुरुष पाशविक प्रकर्ति जाग गयी है
या फिर दूर जाने का बहाना करके,
अपनी कायरता को छुपाना चाहते हो,

तुम भूल गए हो शायद,
की अब तुम्हारी जिंदगी सिर्फ तुम्हारी ही नहीं
मेरे भी जीने का एकमात्र सहारा है
फिर भी गर जाना ही चाहते हो
तो,
जाओ चले जाओ, जहा जाना हो तुम्हे
तुम मुझे, न चाहो, न सही
इसमें तुम्हारा दोष भी नहीं
और तुम्हे दोष देने से फायदा भी क्या
वैसे भी तुम इस "दम्भी पुरुष समाज" के,
बजबजाते हुए एक तुच्छ निमित्त मात्र हो
और
अगर मैं तुम पर दोषारोपण करती भी हूँ
तो ये मेरा, अपने उपर ही लगाया हुआ एक घिनौना इल्जाम होगा,
तुम तो कभी इतने समझदार थे ही नहीं
की प्रेम की मौन भाषा को समझ भी सको
फिर तुमसे क्या कहना
जाओ चले जाओ :(


अमर ====

Tuesday, January 8, 2013

प्रेम या भ्रम


              मै मान भी लूँ
            कि तुम्हे प्यार नहीं मुझसे
            जो भी था,
सब एक छलावा मात्र था
पर इसमें
मेरा तो कोई दोष नहीं
मैंने तो तुम्हे ही चाहा था
चुन लिया था तुम्ही को सदा के लिए

फिर इस बार भी
मै ही सजा क्यूँ भुगतूं 
      हे प्रभु 
तुम बार-बार मुझे ही
क्यूँ चुनते हों
अपनी भृगु दृष्टि के लियें

इसे तुम्हारा प्रेम समझूँ 
      या तुम्हारा उपकार

कैसे कैसे सपने बुने थे
मैंने रेशमी धागों से
तुमने कुछ न सोचा
पल भर में
तोड़ दियें सारें ख्वाब

ये भी न ख्याल आया
इन्ही रेशमी धागों से
बुनी है मेरी साँसों की डोर

तुम तो बस,
तोड़ कर चल दिए
सच !
क्या तुम्हे मुझसे प्यार नहीं
मुझे अब भी ये विश्वास नहीं

अमर====

Thursday, December 13, 2012

मैं एक औरत हूँ


सच,
यही बात है न, की,
मैं एक औरत हूँ
बस यही कसूर है मेरा

बस इसीलिए
मेरा सच्चा स्वाभिमान
तुम्हारे झूठे अभिमान
के आगे न टिक सका

मुझे झुकना ही पड़ेगा
तुम्हारे
झूठे दंभ और अहंकार के आगे

सदियों से यही होता आया
सीता ने राम के लिए
तो
राधा ने श्याम के लिए
क्या कुछ न सहा

फिर मेरी क्या बिसात
तुम्हारे आगे,

फिर भी
हर बार,
बार-बार,
आना ही होगा
तुम्हारे आगोश में

यह जानकार भी
ये कुछ पल का चैन
जिंदगी भर का सकूं छीन लेगा

मैं एक औरत हूँ न
बस
झुकना ही होगा
कभी तुम्हारे तो कभी
तुम्हारे झूठे स्वाभिमान के आगे ----------

अमर=====
 

Thursday, November 22, 2012

भूली -बिसरी यादें





"मैं कोई किताब नहीं,
जिसे जब चाहोगे, पढ़ लोगे तुम
मैं कोई असरार नहीं,
जिसे जब चाहोगे, समझ लोगे तुम ,
मैं हु, तुम्हारे दिल की धड़कन,
जिसे सुनना भी चाहो, तो न सुन सकोगे तुम

कितना ही शोर, हो, तुम्हारे चारो तरफ
न सुन सकोगे तुम ,
कितनी ही उजास हो तुम्हारी रातें,
न सो सकोगे तुम,
पल भर में खीच लायेंगी,
तुम्हे हमारी यादें,
एक पल भी बगैर हमारे,
न रह सकोगे तुम,

मैं हूँ समेटे, अपने दिल में प्यार का दरिया, तुम्हारे लिए
किसी रोज लौटा, तो बहने से, खुद को, न रोक सकोगे तुम"

अमर====