Followers

There was an error in this gadget

Labels

Tuesday, January 8, 2013

प्रेम या भ्रम


              मै मान भी लूँ
            कि तुम्हे प्यार नहीं मुझसे
            जो भी था,
सब एक छलावा मात्र था
पर इसमें
मेरा तो कोई दोष नहीं
मैंने तो तुम्हे ही चाहा था
चुन लिया था तुम्ही को सदा के लिए

फिर इस बार भी
मै ही सजा क्यूँ भुगतूं 
      हे प्रभु 
तुम बार-बार मुझे ही
क्यूँ चुनते हों
अपनी भृगु दृष्टि के लियें

इसे तुम्हारा प्रेम समझूँ 
      या तुम्हारा उपकार

कैसे कैसे सपने बुने थे
मैंने रेशमी धागों से
तुमने कुछ न सोचा
पल भर में
तोड़ दियें सारें ख्वाब

ये भी न ख्याल आया
इन्ही रेशमी धागों से
बुनी है मेरी साँसों की डोर

तुम तो बस,
तोड़ कर चल दिए
सच !
क्या तुम्हे मुझसे प्यार नहीं
मुझे अब भी ये विश्वास नहीं

अमर====

14 comments:

  1. श्रेष्ठ भाव-

    उम्दा ।।

    प्रेम-पुजारी आपका, हाथ हमारा थाम ।

    छोड़-छाड़ कर क्यूँ करे, यहाँ रोज बदनाम ।

    यहाँ रोज बदनाम, काम का 'पहला' बन्दा ।

    क़तर-व्यौंत कतराय, क़तर मत पर आइन्दा ।

    जारी कर विज्ञप्ति, डाल नजरें फिर प्यारी ।

    रविकर पास प्रमाण, श्रेष्ठ यह प्रेम पुजारी ।

    ReplyDelete
  2. प्रेम भ्रम हो सकता है लेकिन भ्रम में रहकर भी अपने प्रेम के प्रति इमानदारी भी प्रेम का एक निर्मल रूप है।

    ReplyDelete
  3. This comment has been removed by the author.

    ReplyDelete
    Replies
    1. This comment has been removed by the author.

      Delete
  4. इंसान जब भी हारता है, सवाल ईश्वर से ही करता है...और जो वो करता है, अच्छा ही करता है...ऐसा ही माना जाता है...और मानना भी चाहिए...
    असफल प्रेम के मनोभावों को अच्छे से दर्शाया है...

    ReplyDelete
  5. अगर विश्वास अपने आप पर ही न होगा तो ईश्वर भी आपका साथ न देगा इसलिए बिना किसी शर्त के प्यार कीजिये बदले में प्यार ज़रूर मिलेगा क्यूंकि प्यार हमेशा पाने का नाम नहीं होता कभी कभी अपने ही प्यार में काँटों का मिलना भी प्यार का ही एक रूप होता है।

    ReplyDelete
  6. प्रेम में मिलन है ... विरह भी है ... किस्मत के साथ हैं ये दोनों ...
    भावों का उत्कृष्ट चित्रण ...

    ReplyDelete
  7. कैसे कैसे सपने बुने थे
    मैंने रेशमी धागों से
    तुमने कुछ न सोचा
    पल भर में
    तोड़ दियें सारें ख्वाब.

    प्रेम में सफलता और असफलता दोनों ही बहुत उथल पुथल करते हैं.

    ReplyDelete
  8. प्रेम के दोनों ही रूप ...

    ReplyDelete
  9. भरम में जिए जाना भी कभी सुकून देता है...
    भावपूर्ण रचना...

    अनु

    ReplyDelete
  10. sundar prastuti*****yatharh prem ki anubhuti ki ushma ki bat alag hai magar kalpnik prem ka aanand aur anubhuti gazab ki hoti hai

    ReplyDelete
  11. भावों की सुंदर उत्कृष्ट प्रस्तुति,,,,

    .recent post : जन-जन का सहयोग चाहिए...

    ReplyDelete
  12. मन की बातें मन ही जाने,
    जो जाने, वो भी न माने।

    ReplyDelete