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Thursday, November 22, 2012

भूली -बिसरी यादें





"मैं कोई किताब नहीं,
जिसे जब चाहोगे, पढ़ लोगे तुम
मैं कोई असरार नहीं,
जिसे जब चाहोगे, समझ लोगे तुम ,
मैं हु, तुम्हारे दिल की धड़कन,
जिसे सुनना भी चाहो, तो न सुन सकोगे तुम

कितना ही शोर, हो, तुम्हारे चारो तरफ
न सुन सकोगे तुम ,
कितनी ही उजास हो तुम्हारी रातें,
न सो सकोगे तुम,
पल भर में खीच लायेंगी,
तुम्हे हमारी यादें,
एक पल भी बगैर हमारे,
न रह सकोगे तुम,

मैं हूँ समेटे, अपने दिल में प्यार का दरिया, तुम्हारे लिए
किसी रोज लौटा, तो बहने से, खुद को, न रोक सकोगे तुम"

अमर====
 

14 comments:

  1. किसी रोज लौटा, तो बहने से, खुद को, न रोक सकोगे तुम"
    वाह ... बेहतरीन भाव लिये उत्‍कृष्‍ट लेखन

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  2. gehre bhav ki sunder rachna............

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  3. बेहतरीन पंक्तिया है मन को छू लेने वाली

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  4. मैं हूँ समेटे, अपने दिल में प्यार का दरिया, तुम्हारे लिए
    किसी रोज लौटा, तो बहने से, खुद को, न रोक सकोगे तुम"

    बहुत सुंदर भावमय रचना,,,

    recent post : प्यार न भूले,,,

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  5. मैं हूँ समेटे, अपने दिल में प्यार का दरिया, तुम्हारे लिए
    किसी रोज लौटा, तो बहने से, खुद को, न रोक सकोगे तुम"....... दिल को छू हर एक पंक्ति....

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  6. संवाद साधना होता है..बहुत सुन्दर कविता..

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  7. अच्‍छी कविता है ।

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  8. बहुत ही उम्दा

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  9. मामूली से बदलाव के बाद तुम्हारी कविता का रूप कुछ इस तरह होना चाहिए ..............



    "मैं कोई किताब नहीं,
    जिसे जब चाहोगे, पढ़ लोगे तुम
    मैं कोई असरार नहीं,
    जिसे जब चाहोगे, समझ लोगे तुम ,
    मैं हूँ , तुम्हारे दिल की धड़कन,
    जिसे जब भी सुनना भी चाहो, तो सुन सकोगे तुम

    कितना ही शोर, हो, तुम्हारे चारो तरफ
    फिर सुन सकोगे तुम ,
    कितनी ही उजास हो तुम्हारी रातें,
    न सो सकोगे तुम,
    बिने सुने मेरी शांत वाणी को
    पल भर में खीच लायेंगी तुम्हे ,
    हमारे करीब ,हमारी ही यादें,
    एक पल भी बगैर हमारे,
    न रह सकोगे तुम,

    मैं हूँ समेटे, अपने दिल में प्यार का दरिया, तुम्हारे लिए
    किसी रोज लौटा, तो बहने से, खुद को, न रोक सकोगे तुम"

    अमर====

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  10. Shukriya di aapka ashirwad mil gaya, ab nikher gayi hai rachna

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  11. शुक्लाजी आज आपकी लेखनी को देखा ..बहुत अच्छी लगी ....

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  12. http://www.parikalpnaa.com/2012/12/blog-post_4920.html

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