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Monday, March 18, 2013

"एक उम्मीद "





कल रात से ही 
आसमा में 
काले घनेरे मेघो का जमावड़ा 
किसके लिए -------

आज सुबह से ही 
हर तरफ , हर गली 
चीखते -चिल्लाते लोग,
त्राहिमाम- त्राहिमाम --------

एक -एक तिनका 
तोड़कर-जोड़कर ,
अपने सपनो को संजोकर 
रखा था करीने से, अलमारियों में 

बीती रात की बेला  
सब बहा कर ले गयी 
संग अपने 
अलमारियों से ,

आज तुम भी 
बेचैन हो शायद 
क्या तुम्हारा घर भी 
कल रात की बारिश गुलजार कर गयी ?

आज एक नयी सुबह 
एक नयी जगह 
फिर से कुछ नए तिनके 
बटोरने है एक नए आशियाने के लिए 

अमर====

8 comments:


  1. तोड़कर-जोड़कर ,
    अपने सपनो को संजोकर
    रखा था करीने से, अलमारियों में
    ............वाह कितना सुन्दर लिखा है आपने, कितनी सादगी, कितना प्यार भरा जवाब नहीं इस रचना का........ बहुत खूबसूरत....... !!!

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  2. ज़िंदगी का दूसरा रूप ही यही है शायद क्यूंकि इन तिनकों को बटोरते-बटोरते सारी उम्र गुज़र जाती है मगर एक ठहरा हुआ आशियाँ कभी नहीं बनता। भावपूर्ण अभिव्यक्ति...

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  3. आज एक नयी सुबह
    एक नयी जगह
    फिर से कुछ नए तिनके
    बटोरने है एक नए आशियाने के लिए very nice...

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  4. वाह क्या गजब का चित्रण किया है समूचे वातावरण का
    बधाई

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  5. नयी सुबह,नयी तलाश,नए तिनके,नया आशियाना सुन्दर चित्रण

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  6. हर नई सुबह फिर से जीने की कोशिश, यही ज़िंदगी है... बधाई.

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  7. मुंबई का मंज़र याद आ गया ...जब बारिश ने किसी को नहीं बख्शा था

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