Followers

There was an error in this gadget

Labels

Monday, October 26, 2009

आँखों में सैलाब

वो रात ही ऐसी  थी ,
वो बात ही ऐसी थी
अश्क उसकी आँख में भी थे ,
अश्क मेरी आँख में भी थे ,
समुंदर सा सैलाब था हमारी आँखों  में ,
निकलने को बेताब ,
रोक रखा था किसी तरह हमने अपनी पलकों के बांधो से,
फिर भी वो बेताब था उन्हें तोड़कर बह जाने को ,
न चाहते हुए भी हम अश्को को बहने देना चाहते थे ,
अकेले में सारे बांध खुद तोड़ देना चाहते थे ,
रात भेर बैठे रहे आँखों में आँखे डालकर ,
हम बिन कहे ही सब कुछ कह गए ,
बना के आँखों को अपने लफ्जो का सहारा
सीधे उन के दिल में सब कुछ कह गए ....

हम रात भर बैठे रहे ....
कभी कुछ तो कभी कुछ सोचते रहे
सुबह को हम जिस मोड़ पे मिले थे कभी
उसी मोड पे हंसते हंसते  अलविदा कह गए .....
अश्क उसकी आँख में भी थे ,
अश्क मेरी आँख में भी थे ,

8 comments:

  1. अमरेन्द्र ! आपकी कविता बहुत खुबसूरत
    है ! एक दिन दुनिया जानेगी आपको !
    बिना किसी की परवाह किये बस लिखते
    रहिये !मेरी शुभकामनायें आपके साथ हैं !

    ReplyDelete
  2. कल 22/03/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल (संगीता स्वरूप जी की प्रस्तुति में) पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

    ReplyDelete
  3. बिछड़ने के वक्त से पहले का सुन्दर चित्रण...अश्कों के आने,रोकने ,बहने के भाव... अच्छे हैं

    ReplyDelete
  4. जुदाई से पहले का दर्द उमड़ रहा है रचना में

    ReplyDelete
  5. बहुत सुंदर और मर्मस्पर्शी रचना...

    ReplyDelete