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Saturday, September 4, 2010

''मेरी मंजिल''

''मेरी मंजिल''




''करता रहा


इबादत,


सारी उम्र उसकी,


कभी 'वो'


मेरे


पास न आया,


खत्म हूआं,


जो


सफ़र मेरा,


वो बन के


मंजिल मेरी,


मुझको 'खाक' में


मिलाने आया''

6 comments:

  1. bahooy hi achchhe jajbat ke sath ek sunder see kavita...........

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  2. बहुत खूब । शुभकामनायें

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  3. Nirmala Ji Yaha tak aane k liye aapka bahut bahut shkriya.............

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  4. आपका ब्लॉग पसंद आया....इस उम्मीद में की आगे भी ऐसे ही रचनाये पड़ने को मिलेंगी......आपको फॉलो कर रहा हूँ |

    कभी फुर्सत मिले तो नाचीज़ की दहलीज़ पर भी आयें-
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  5. Sanjay ji mai puri kosis karunga ki apki umeed kahali na jaye bua aap aise hi pyar banaye rakhiyega...............

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