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Friday, April 23, 2010

"साथ चलने का वादा"


"साथ चलने का वादा"

दो चार दिन की कहानी ही सही
वो साथ चलने का वादा निभा न सके

राहे जुदा थी, तो क्या हुआ
साथ अपने वो यादे , ले के जा न सके

दूर होकर भी उन्होंने कुछ ऐसा उलझाया
चाह के भी हमे कोई सुलझा न सके

सागर के पहलु में जा के भी हम
गहराई सागर की कभी पा न सके

लड़ते रहे सारी उम्र जिनसे
उन्हें हम अपना दुश्मन कभी बना न सके

राज की बात करते रहे सारी उम्र जिनसे
उन्हें राजदां कभी कह न सके

अपनी तो बस यही रवानी रही
पास आकर भी हम सभी के, किसी के पास आ न सके ..

2 comments:

  1. Dude.nice lines...
    you have potential to become a very good gazal writer. you have nice thoughts, you just need to work on your urdu vocab and follow the gazal rules properly. rest you already have..Best of luck!

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  2. SHKURIYA PUSHKER JI ............ BAHUT ACCHE LAGE AAPKE VICHAR ,,,,,,,,,,,NEXT TIME JARUR SUDHAR LAUNGA OR URDU KE UPER BHI MEHNAT KAR RAHA HU...........

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