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Friday, November 25, 2011

****और लौ फिर बुझ गयी ****


खंडहर, 
मेरी यादों के
जहा बसते है मेरे,
सपने 
जो अब बचे है सिर्फ 
फड़फड़ाते  हुए ...
जिनके पंखो में 
अब नहीं  है 
उड़ने की शक्ति,
हो  गए  है 
निमित्त मात्र, 
फिर भी कभी -कभी   
करते है,
कोशिश 
आखिरी उड़ान  की 
शायद  उन्हें याद आ जाती है 
उसी बुझते हुए  दीपक की 
आखिरी लौ

देखकर लगन उसकी 
लगता है की अगले ही पल 
शायद पूरे हो जायेंगे 
सब सपने मेरे 

जो अब तक खंडहर में छुपे फिरते थे 
वो आ जायेंगे खुल के सबके सामने, 
फिर अगले ही पल 
पता चलता है की 
बस इतना ही तेल था 
जलाने को , दीपक में 
और लौ फिर बुझ गयी 

फिर से वही अँधेरा 
फिर से वही खंडहर
जहा मेरे सपने अब भी  है 
इसी आस में 
की शायद कोई आये , उन्हें पूरा करने *******

Thursday, November 3, 2011

"मंजिल की तलाश में"


मेरी  मंजिल!!
न ये जिंदगी है ....
न ये आसमां........, 
हर सुबह दौड़ता हूँ 
फिर भी मंजिल की तलाश में !!!!!!!!

कोई पुकारे मुझको,
मेरे अतीत से 
तो कोई सामने  से
मुझको आवाज दे , 
गंतव्य है मेरा कहाँ , नहीं जानता 
बस दौड़ता जाता हूँ ,  बेकस ,बेबस , बेसबब
मंजिल की तलाश में !!!!!!!!

मै बन गया हु,
इक रेल का डिब्बा,
है कौन सा स्टेशन , मेरा अंतिम पड़ाव 
नहीं जानता, 
रुकता हूँ कुछ घडी , कुछ पल 
फिर अगले ही पल 
आती है इक आवाज ssssssss
बदल देती है जो मेरी पहचान के मायने 
मै फिर दौड़ने लगता हूँ 
मंजिलो की तलाश में !!!!!!!

यहाँ है सबके अपने अपने उसूल
सबके अपने अपने दायरे 
कुछ घडी तो,
साथ चले हमसफ़र बनके 
फिर अगले ही स्टेशन पर
उतर पड़े अजनबी बनके, 
मै फिर दौड़ने लगता हूँ 
मंजिल की तलाश में !!!!!!!

                                             अमरेन्द्र शुक्ल 'अमर'

Wednesday, October 19, 2011

"तेरी महक क्यूँ नहीं जाती"

"इन नशीली फिजाओं से, तेरी महक क्यूँ नहीं  जाती 
बरसों से ये  टिमटिमाती लौ,अब क्यूँ बुझ नहीं जाती "

ए सनम! 
"मुझे भी दे पता, तू उन बेदर्द  रातो का 
जहाँ पर तुझे रहकर ,मेरी याद नहीं आती "

"मेरी जिंदगी सुलगती है ,हर पल  तेरी  जुस्तजू की खातिर 
 मुझे  इक बार में ही जलाने क्यूँ नहीं आती  "

"तुने मुझको भुलाया है ,या भूली है खुद को भी 
शायद तुझे... मेरी या अब खुद की आवाज ही नहीं आती "

"क्यूँ अपलक निहारती हो मुझको , दरवाजे की दरारों से 
पल भर के लिए ही सही,  तू इन दरारों को भरने क्यूँ नहीं आती "

"मेरी जिंदगी फ़ना है ... ,फ़ना है मेरी मौत भी तुझ पर 
तू इक बार में ही मुझको हराने क्यूँ नहीं आती "

Thursday, September 29, 2011

जिंदगी से कुछ पल उधार लिए




तेरी तस्वीर को दिल से लगाये बैठे है 
हम अपनी  ख्यालो की अलग दुनिया  बसाये बैठे है 
जिंदगी जो , अब तक व्यर्थ थी, मेरी
उसे तेरे लिए फागुन का मदमाता मौसम बनाये बैठे है 

महकी महकी सी साँसे मेरी 
तुमसे मिलने की है अभिलाषा मेरी 
अकेले ही चला था अमृत की तलाश में 
अब, तुझे पाने की आस में अपनी मृग तृषा बुझाये बैठे है 

दर्द की अंधी गली है , कोई भी न मोड़ है 
सभी स्वप्न टूटकर बिखरे है यहाँ, फिर भी 
हम तेरी खातिर उन गलियों से
रिश्ता निभाए बैठे है  

तेरी तस्वीर क्या मिली , मुझे यूँ लगा आइना मिल गया मुझको 
'सूरत-ए- अमर'  आईने में देखी नहीं कभी, तेरी तस्वीर को आईना बनाये बैठे है 

मिल गयी 'रौनक ए जहा' मुझको ,तेरे नाम से  
हम अपने नाम को तुझसे मिलाये बैठे  है 
बहारो ने भी लंगर डाल दिए, तेरे नाम से 
जो  झील के उस पार डेरा जमाये बैठे है 

मेरी हसरतो के तकाजो ने तेरे लिए, जिंदगी से कुछ पल उधार लिए 
हम अपनी हैसियत तो भूले ही थे , वो भी अब अपनी दुनिया भुलाये बैठे है 

Monday, August 29, 2011

"वो आना तो चाहती थी !"



उसने  छिपाया  तो बहुत 
पर छुपा  न  पायी  
चेहरे की लाली 
सुर्ख आँखों  से बहे  काजल  का पानी 
वो छिपा  न  पायी  


यु  तो भूली  
वो सारी  कहानी 
बस  दो  पल  कि कहानी  
दर्द में डूबी 
पूरी जिंदगानी भुला  न  पायी 



गयी तो थी 
रात के  घोर अन्धियारें  में 
घर की चार दिवारी लाँघ  कर 
नहीं  पता  था उसे 
कि वो जिसे  लाँघ  कर जा  रही  है  
वो चार दिवारी उसके  घर  की नहीं  
उसके  माँ- बाप  की जीवन  रेखा  है  


किसी के  प्यार  में 
बन्द हो गयी  थी आँखे  
उसकी  
या ,  
खुल  गया  था समाज  का  मुहं 
उसके  लिए  
इन सब से वो अनजान थी 

वो तो बस  जाना  
चाहती थी 
ये सारे  बंधन  तोड़  कर 
किसी ओर  से जोड़ने  के  लिए  


वो चली भी गयी 
छोड़  गयी  
अपने  पीछे  
बहुत कुछ अनकही सी कहानियाँ 

दो  दिन  भी  न  सह  सके  
ये वज्रघात 
उसके  माँ  बाप ....................


बेचारी क्या करती 
वो आना तो चाहती थी 
वापस वही 
जहाँ से चार दिवारी ,
लांघ कर गयी थी
उस काली रात 

पर उसे अहसास हो चला था 
कि रात के सन्नाटे में चार दिवारी लांघना 
आसान  है     
पर 
दिन   के   उजाले   में,
सब   के   सामने , 
अपने  ही घर   के   दरवाजे  से 
भीतर  आना बहुत  मुश्किल  है   

                                       अमरेन्द्र 'अमर'