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Thursday, April 21, 2011

तुम भी चले आना'



जब तक 
तुम्हारी  खुशिया तुम्हारे साथ है 
तुम कही भी रहों, 
पर जब भी तुम उदास होना
आँखों में बारिश का अहसास होना  
चाहो तुम किसी अपने के,
काँधे पे सर रख कर रोना 
तब बिन बताये 
बिन बुलाये 
चले आना 
मै इन्तेजार करूँगा तुम्हारा 
मै भी साथ दूंगा तुम्हारा 
अभी मुझ पे तुम्हारा एहसान बाकी  है 

मै बहुत रोया था उस रात 
जो तुमने सहारा दिया था, 
अपने आँचल का 
"बहुत भीगा था उस रात 
वो आँचल तुम्हारा,
उसकी वो नमी अब भी तेरे रुखसार पे है,"

तब से अब तक न रो सका हूँ मै
जब कि आँसू-ए- समुन्दर अपने सबाब पे है 
चले आना इसी बहाने, 
क्या पता ये बाँध कब टूट जाये  
और इस सैलाब में,
मै बह जाऊ,
इससे पहले तुम चले आना 
इसे बहाने......... 
 
जब भी आना बिन बताये'
बिन बुलाये;
बुलाया तो गैरों को जाता है 
अपने तो बस चले आते है ,
अपनों से मिलने 
तुम भी चले  आना'

Thursday, March 24, 2011

अंतिम क्षण


  
चारो तरफ फैली है यादें तेरी
फिर भी यादें कम है 
दर्द पहले से ज्यादा हुआ है, 
फिर भी दर्द कम है .....

सपने है आँखों में जागे जागे 
और आज आँखों में नींद कम ,है 
यूँ  तो जी रहे है हम जिंदगी से ज्यादा 
फिर भी लगता है ये जिंदगी कम है..... 


यु तो देखे है हमने, जीवन के 
सब रंग,
फिर भी ये तेरे रंग से रंगी कम है ......
मै अब  कही  भूल  न  जाऊ ,
तुम्हे, भूल जाने के बाद,
अब इक यही गम है 

आ जाओ मेरी रूह-ए- तमन्ना 
कि तुमसे मिलें जमाना बीत गया, 
यादें है तेरी, मेरी साँसों में बसी,
पर लगता है शायद अब मेरी साँसे कम है 
आ जाओ मेरी रूह-ए- तमन्ना !!!!  ...........


Thursday, February 24, 2011

आने वाली शाम



ये दिन भी बड़े अजीब  हैं 
जब शाम ढले तुम पास आते हों 
दोपहर अपनी सुनहरी चादर समेटता
शाम फैलाती अपनी ठंडी-ठंडी बाहें

रात की रागिनी करती हमारा इन्तजार 
अपनी पनाहों में लेने को 
चाँद भी चांदनी को भेजता ज़मी पर
हमे अपनी भीनी भीनी रौशनी में जगमगाने को 

ये तारे भी 
हमे अपने होने का अहसास दिलाते 
देख कर हमारे मिलन की बेला 
कही दूर गगन में टूट से जाते

तारो से बिछड़ने का गम 
चाँद भी न सह पता
मुझे तेरे आँचल में देखकर 
चंद पलो में रात को लेकर चला जाता 

और कब हमारे मिलन की ऋतु बीत जाती  
ये हम जान भी न पाते 
हम फिरआने वाली शाम का इंतजार करते, 

ये दिन भी बड़े अजीब  हैं 
जब शाम ढले तुम पास आते हों 

Thursday, February 3, 2011

"गुनाहगार"

फांसले  भी मिट गए 
दूरियां भी न रही,
वो लकीर ही न मिटी 
जो तुम खींच के गए,

पास भी आते गए 
दूर भी जाते गए , 
नजदीकियां भी रही, दरमियाँ
और वो दूरियां भी बढ़ाते गए,

हम सहरा - ए - मुहब्बत में ,
कुछ ऐसे उतरते  गए,
सरे बाज़ार रुसवा हुए
मोहब्बत - ए - झील में 
और वो खड़े देखते गए ,
 
"इस फरेबी दुनिया में ऐसा कई बार हुआ , 
गुनाहगार कोई और था, गुनाहगार कोई और हुआ "

Thursday, January 13, 2011

"मेरे जीवन साथी"


हों तुम क्या मेरे लिए 
कैसे बताऊँ, 
मै तुमसे अब कैसे छुपाऊ
कुछ मैं आधा  अधुरा  हूँ  
कुछ तुम पूरी - पूरी है,
फिर मै कैसे कहू की 
ये तुम हो !
ये मै हूँ !
जब की हम एक है 

गिर रही है बिजली
सागर में दूर कही,
उठ रही है तरंगे
मेरे मन में यहीं कही,
छा रहा है आँखों में नशा
तेरे खुमार का, 
फिर मै  कैसे कह दूँ 
ये तुम हो !
ये मै हूँ !
जब की हम एक है 

तुम बदले तो क्या बदले
पर्वतों  के  भी रंग
बदल गए,
पंछी ठहरे रात को 
और दिन में मचल गए,
फिर मै कैसे कह दूँ  की 
ये तुम हो
ये मै हूँ 
जब की हम एक है 

गंगा -जल  
मैला नहीं है आज भी, 
न जाने कितनो ने,
इसमें डुबकी लगायी
वो तो तारनहार  है,
तारेगी,  
मेरे इस जीवन को ,
तुम तो सदियों से मेरी हों
जन्मो - जन्मो को तारोगी  
फिर मै कैसे कह दूँ 
की ये तुम हो 
यें में हूँ
जब की हम एक है 

"मेरे जीवन साथी"