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Monday, November 1, 2010

दुनिया के रंग


मै दुनिया के हसीन रंगों में, 
अपनी खुशी का रंग ढूँढता  रहा ,
कुछ तो जाने जाने पहचाने मिले ,
बाकियों का वजूद ढूँढता  रहा ,

जिस रंग को सब मिल रहे थे 
सब अपने चेहरे पे मढ़ रहे थे 
मैंने भी सबकी देखा देखी,
उस रंग  को चुन लिया ,

कोशिश की चढाने की,
उन्हें अपने रंग पे, 
कुछ तो चढ़ा  मेरे हिसाब  से,
कुछ अपने रंग में चढ़ गया, 

कुछ दिन तो चमकता रहा, 
फिर वो भी हसने लगे ,
मुझे मेरी वही सूरत 
फिर से दिखाने लगे,
 
दो दिन में ही उसने अपना रंग ,
दिखा दिया, 
मै जैसा था वैसा ही मुझको,
बना दिया, 

"ये सारें रंग,
चढ़ के भी मुझपे, 
बेरंग नजर आते है, 
ये दुनिया के रंग है,
जो दो पल में उतर जाते है,..............."

"सदियाँ गुजर गयी वो रंग नहीं उतरा, 
जहाँ पे सर रख कर वो  इक बार जो रोया था "

अमरेन्द्र "अक्स"

आखिरी सफ़र


सो जाने दो,
मुझे मेरे बिस्तर पे आज  ,
कई सदियों  से ,
सोया नहीं हूँ,
उन बाँहों  की आस में...............

बिस्तर  पे मेरे  ,
टाट का पैबंद है,
तो क्या हुआ, 
नींद फिर भी चैन की आएगी मुझको, 
सदियों से उसके अह्सांस ने, 
सोने नहीं दिया............... 



Tuesday, October 26, 2010

आज बिखरा है सन्नाटा,



आज बिखरा है सन्नाटा,

मेरे चारो ओर,

कोई भी नहीं है यहाँ,

सिवाय अकेलेपन के,



मेरे मन के रातों के झिंगुर,

भी जैसे खुद को चिढ़ा रहे हो,

खुद अपनी ही आवाज को सुनके,

अपना मन बहला रहे हो,



फैली है चारो ओर नीरवता,

कैसे करेगा कोई कविता,

शब्द भी निकलने से पहले,

सोचते है सौ बार,

बहार निकलकर गूजुँगा मै अकेला ,

या होगा बेड़ा पार,

हर बार यही सोचकर चुप रहता हूँ,

और बिखर जाता है सन्नाटा,

मेरे चारो ओर, मेरे चारो ओर ............................

Saturday, October 9, 2010

'अंजाम - ए - वजू'





वो पूँछ बैठा मुझसे

मेरी मंजिल का पता

मै तो सफ़र में मशगूल था

मंजिल का मुझको क्या पता

बस ये ही मेरा कसूर था



मेरे सफ़र की शुरुआत थी या उसका अंत

कुछ भी तो मुझको न था पता,

मुझे तो साथ-साथ चलना था उसके

ये ही मेरी आरजू थी

मंजिल तो आनी ही थी

जब हमसफ़र ऐसा हसीन था





न जाने क्यू,

बीच सफ़र में उसके कदम डगमगाने लगे,

हाथों में पसीना, चेहरे पे भाव डगमगाने लगे

दस्तक देने लगी थी रुसवाईया

सफ़र में मेरे ,

" जो अभी शुरू ही हुआ था"

अभी तो और भी सफ़र

चाहता था तय करना

पर क्या पता था

ये मेरा उसके साथ आखिरी सफ़र होगा "

''मै कस के थामे खड़ा था,

अब तक जिस दामन को.

समझ के अपना दामन,

वो छुटने लगा था , मेरे हाथो से कुछ ऐसे

बन के बिगड़ रहे हो, तेज नशीली आंधियो में,

रेत के टीले जैसे''



मै सफ़र में अपने अभी चंद कदम ही चला था

जिसे अपनी मंजिल का धुंधला सा "अक्स " दिखा ही था

वो फना हो रहा था टुकडों - टुकडों में

ये ही उस सफ़र का 'अंजाम - ए - वजू' था

Thursday, September 23, 2010

"खेवैया"





खुश नसीब है हम


जो हमकों वो ,


"साहिल" पे छोड़ गए


ले जाते बीच भवर में


बन के मेरे "खेवैया"


तो हम कहाँ जाते,


हम तो पथिक है,


कच्ची गलियों के,


बीच भवर में कैसे टिक पाते,


ये अहसान है उनका,


जो साहिल पे छोड़ गए "