Wednesday, June 9, 2010
"फिर साथ - साथ चलते है"
मेरी जिंदगी के कुछ लम्हे,
खास बन गए,
जब तक थे साथ मेरे
मेरी सांस बन गए,
मै हूँ जब तक,
मै हूँ आपका ,
आप भले ही हमसे ,
घात कर गए ,
आप समझ न पाए
मेरे हालात को ,
बेवफाई का नाम दिया है,
मेरे जज्बात को ,
याद तुम्हे आती न होगी
मुमकिन है ये
पर जब आती होगी
तो बस "याद" आती होगी
बहते होंगे तेरे भी नैनों से झरने,
जब यादों के झुरमुट में आते होंगे,
कोई तो काँटा होगा,
जो तुम्हारे दामन में चुभ जाता होगा ,
बंद कर के अपनी आँखे,
तुम निकल न पाते होंगे ,
लाख कोशीस करके भी
कुछ पल को ठहर जाते होगे,
चलो मिलते है एक बार फिर से
शिकवे भी दूर करते है,
वक्त ने साथ दिया
तो फिर साथ - साथ चलते है,
Thursday, May 20, 2010
"खामोश निगाहे"
मेरी खामोश निगाहे,
अब भी तेरा पता ढूंढें,
तू कही भी हो
ये तेरा ही निशाँ ढूंढें ,
मै कैसे कह दू
ये भूल गयी है तुझे ,
ये अब भी उस गली में
पलके बंद कर के अपनी, तेरा ही मकां ढूंढे,
शाम होते ही
पैमाने भी देखकर ,
मुझको अपने आगोश में
निकल पड़ते है तेरा पता ढूंढे ,
रात होती है जो
गमो के साथ ए 'अक्स',
तो खुद सवेरा
आने का बहाना ढूंढे ,
वक्त गुजारे है
तेरे दामन में जो हमने ,
मेरी आँखे उन्ही सुरमयी
नजारों का निशाँ ढूंढे ,
सुर्ख लाली सी छायी है आज भी आँखों में
ये तेरी बिंदिया की लाली को आज भी ढूंढे I
अब भी तेरा पता ढूंढें,
तू कही भी हो
ये तेरा ही निशाँ ढूंढें ,
मै कैसे कह दू
ये भूल गयी है तुझे ,
ये अब भी उस गली में
पलके बंद कर के अपनी, तेरा ही मकां ढूंढे,
शाम होते ही
पैमाने भी देखकर ,
मुझको अपने आगोश में
निकल पड़ते है तेरा पता ढूंढे ,
रात होती है जो
गमो के साथ ए 'अक्स',
तो खुद सवेरा
आने का बहाना ढूंढे ,
वक्त गुजारे है
तेरे दामन में जो हमने ,
मेरी आँखे उन्ही सुरमयी
नजारों का निशाँ ढूंढे ,
सुर्ख लाली सी छायी है आज भी आँखों में
ये तेरी बिंदिया की लाली को आज भी ढूंढे I
Friday, April 30, 2010
"मोम का जिस्म "
मोम का जिस्म लेकर,
आग से खेला किया,
मुमकिन थी जीत मेरी,
पर हर पल हारा किया,
ये मालूम था इस खेल में,
हार होनी है मेरी ,
पर न था ये मालूम,
की जिसे जीता रहा हर पल ,
उसी ने मेरी "हार का सौदा " किया,
फिर भी अफ़सोस न होता हार का,
जो हार मेरी उसके आगोश" में होती,
पर वो बेरहम यहाँ भी ,
बस दूर से खेला किया ,
और मै "मोम का जिस्म " लेकर,
आग से खेला किया !
आग से खेला किया,
मुमकिन थी जीत मेरी,
पर हर पल हारा किया,
ये मालूम था इस खेल में,
हार होनी है मेरी ,
पर न था ये मालूम,
की जिसे जीता रहा हर पल ,
उसी ने मेरी "हार का सौदा " किया,
फिर भी अफ़सोस न होता हार का,
जो हार मेरी उसके आगोश" में होती,
पर वो बेरहम यहाँ भी ,
बस दूर से खेला किया ,
और मै "मोम का जिस्म " लेकर,
आग से खेला किया !
Friday, April 23, 2010
"वफ़ा ए खुशबू"
"वफ़ा ए खुशबू"
मेरी नजरो से नजरे चुराने लगे है
शायद "मुझे छोडकर" वो जाने लगे है
अब "वफ़ा ए खुशबू" भी नहीं आती उनसे
शायद वो अब झूठा लिबास ओढ़ के आने लगे है
तेरा चेहरा हमे आइना दिखता है
मेरी हर खुशी का रंग इसी पे खिलता है
कुछ दिनों से जिंदगी में या तो कोई खुशी नहीं आयी
या खुशी का रंग अब पीला दिखता है
तू गम न कर
इस गम के फ़साने में
तुझे आवाज न दूंगा
खुशिया अगर दोबारा लौटी
तुझे दौड़ के बुला लूँगा .....
शायद "मुझे छोडकर" वो जाने लगे है
अब "वफ़ा ए खुशबू" भी नहीं आती उनसे
शायद वो अब झूठा लिबास ओढ़ के आने लगे है
तेरा चेहरा हमे आइना दिखता है
मेरी हर खुशी का रंग इसी पे खिलता है
कुछ दिनों से जिंदगी में या तो कोई खुशी नहीं आयी
या खुशी का रंग अब पीला दिखता है
तू गम न कर
इस गम के फ़साने में
तुझे आवाज न दूंगा
खुशिया अगर दोबारा लौटी
तुझे दौड़ के बुला लूँगा .....
"साथ चलने का वादा"
"साथ चलने का वादा"
दो चार दिन की कहानी ही सही
वो साथ चलने का वादा निभा न सके
राहे जुदा थी, तो क्या हुआ
साथ अपने वो यादे , ले के जा न सके
दूर होकर भी उन्होंने कुछ ऐसा उलझाया
चाह के भी हमे कोई सुलझा न सके
सागर के पहलु में जा के भी हम
गहराई सागर की कभी पा न सके
लड़ते रहे सारी उम्र जिनसे
उन्हें हम अपना दुश्मन कभी बना न सके
राज की बात करते रहे सारी उम्र जिनसे
उन्हें राजदां कभी कह न सके
अपनी तो बस यही रवानी रही
पास आकर भी हम सभी के, किसी के पास आ न सके ..
वो साथ चलने का वादा निभा न सके
राहे जुदा थी, तो क्या हुआ
साथ अपने वो यादे , ले के जा न सके
दूर होकर भी उन्होंने कुछ ऐसा उलझाया
चाह के भी हमे कोई सुलझा न सके
सागर के पहलु में जा के भी हम
गहराई सागर की कभी पा न सके
लड़ते रहे सारी उम्र जिनसे
उन्हें हम अपना दुश्मन कभी बना न सके
राज की बात करते रहे सारी उम्र जिनसे
उन्हें राजदां कभी कह न सके
अपनी तो बस यही रवानी रही
पास आकर भी हम सभी के, किसी के पास आ न सके ..
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