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Saturday, October 24, 2009

वो मेरी समझ

वो साहिल, साहिल न था जिन्हें हम साहिल समझे ,
वो भवर से भी ज्यादा गहरा था ,

वो कली, कली न थी जिन्हें हम कली समझे ,
वो कांटे से भी कटीली थी ,

वो कश्ती कश्ती न थी जिन्हें हम कश्ती समझे ,
वो कश्ती कागज की कश्ती से भी नाजुक निकली ,

वो सफ़र,सफ़र न था जिस पे हम हमसफ़र खोजने निकले ,
वो सफ़र मेरा अंतिम सफ़र निकला ,

ऐसे ही लोग आते रहे !!!!!!!!! मिलते रहे !!!!!! और जाते रहे !!!!
ऐसे ही हर बार मुझे समझाते रहे ,

मै समझता रहा उन्हें कुछ और
वो कुछ और ही समझाते रहे ,,,,,,,,,,

Wednesday, October 21, 2009

मन की चंचलता

वो चंचल हवाये,
वो काली घटाए,
वो नीला आसमान,
वो सतरंगी जहाँ ,
हर्साता है मेरे मन को ,

जब कभी खो जाता है मेरा मन ,
वो वापस बुलाता  है मुझको ,

वो महकी बगिया ,
वो महका चमन ,
वो खिली कलिया,
वो खिला बदन ,

जब भी निराश होता हूँ ,
समझाते है मुझको ,

की खोकर अपना सबकुछ हम देते है खुशिया जहा को
बिना कुछ लिए ,
तब फिर तू  इतना  निराश है क्यू
जब की तू पा चूका है सब कुछ ,
अपनी चंचलता में जियो ,
न हो उदास , न होने दो किसी को , 
मेरे मन की चंचलता !!!!!!!!!!!

Friday, October 16, 2009

"मेरी माँ "

मै हँसा तो हँसी मेरे साथ ,
मै रोया तो रोई मेरे साथ ,
मै जगा तो जगी मेरे साथ ,
मै सोया तो सोई मेरे साथ ,
खुद की कोई परवाह न की ..
हर कदम हर घडी मेरे साथ
"मेरी माँ"

मै कैसे भूल जाऊ वो पल ...
जब मेरी हँसी की खातिर वो रो भी न पाई
रोना भी चाहा तो उसे बस मेरी याद आयी,
वो जानती थी उनको रोता देखकर ...
शायद  मै भी रो पडूंगा .....
ये सोचकर वो आंसुओ को भी छुपा गई  ...
"मेरी माँ "

रात भर  जाग- जाग कर मुझे सुलाती मेरी माँ ...
खुद को सुखा कर मुझे खिलाती मेरी माँ ...

कभी न सोचा अपने तन का
हरदम मुझे कुछ नया पहनाती मेरी माँ ....
दो साड़ी में गुजार दी उम्र सारी....
मुझे पहनाती रही हर बार नया ....
"मेरी माँ "

Wednesday, October 14, 2009

वो लम्हे

अगर कुछ देना ही है तुझे ,
तो दे दे मुझे मेरी वो हँसी,
जो बचपन में थी ....
जब हर बात पे हँसता था मै ....

कुछ देना ही है तुझे
 तो दे दे मुझे मेरे वो बचपन के साथी ..
जो हर वक्त साथ थे मेरे ...
वो खुशी हो या गम.....
मेरे साथ ही हस्ते थे ..
मेरे साथ ही रोते थे....

कुछ देना ही है तुझे ,
तो दे दे मुझे मेरे वो मिट्टी के खिलोने ,
जिनमे जान न थी ..
पर उनमे मेरी जान थी ..
उनके टूटने पे होता था दर्द मुझे ..
करता था उनकी पट्टी ..
अपने हाथो से ....
और फिर अपने दोस्तों को बताना की ,
आज मेरी गुडिया की एक टांग टूट गयी ..
और उनकी हमदर्दी अच्छी लगती ....

अगर कुछ देना है तो मुझे ......
कर दो मेरा बचपन मुझे नसीब..
ओ मेरे "रकीब" 

एक तलाश


चंचल  लहरें ,
बिलकुल  जीवन  सी ....
कभी  शांत  
अँधेरी  रात  के  जैसे  .....
कभी  ऐसी  मची  हलचल  ....
की  सब  बिखेर  गया ..
मेरे  जीवन  के  जैसे  ..
चाह  कर  भी  कुछ  कर  नहीं  पाता अपने  मन  का ..
सब  होता  है  उसी  के  मन  का  .....
क्या  करू .....???????
कोई  तो  बताओ .......
इस  अनजान  रहो  में  कोई  तो  आओ .....
साथ  न  चलना  चाहो  मेरे  कोई  बात  नहीं ....
खुशी तुम्हारी !!!!!
एक  झलक रोशनी  की  तो  दिखा  जाओ .........
और न चाहिए कुछ भी .....
इक बार राह तो दिखा जाओ...........