Followers

Labels

Powered By Blogger

Monday, February 18, 2013

"बेइंतेहा मोहब्बत"




अभी कल ही तो खरीदी है हमने 
दो-चार पल की खुशियाँ 
कुछ  हसी
कुछ गम
और साथ में----------थोड़े से आँसू,!!

देखते है कितने दिन चलती है 
पर हा, 
अब मैं किसी से कुछ साझा नहीं करता 
तुम भी मुझसे कुछ सांझा करने को मत कहना 
अब मैं इस मामले में थोडा स्वार्थी हो गया हूँ !!

इस महंगाई के ज़माने में 
अब क्या क्या साझा करू 
वैसे भी कुछ बचा के नहीं रखा 
तुमसे -------
और जो रखा है उसमे अब----तुम तो नहीं ही हो !!

न जाने आगे समय रहे न रहे
न जाने आगे मैं इन्हें फिर से खरीद भी पाऊं या नहीं ,
या बस दूर से ही मन मसोस कर रहना पड़े 
इसलिए, 
मैं इन्हें जी भर के अकेले ही 
भोगना चाहता हूँ 
वैसे भी दूर से आती इनकी महक 
और खुद से ही टकराकर लौटती इनकी प्रतिध्वनि
मुझे पागल सा कर देती है !!

हा कभी तुम भी चाहो 
-----------कुछ ऐसा ही 
तो बस किसी से बेइंतेहा मोहब्बत कर लेना !!

अमर =====

Saturday, February 2, 2013

“समय के घाव“



देव !
आज तुम कोशिश भी न करना
इन्हें (समय के घाव), छूने की -------
निकालने की तो,
सोचना भी नहीं
बहुत तकलीफ होगी
-----तुम्हे भी और मुझे भी

बड़े ही जतन से,
सहेज कर रखा है इन्हें मैंने -------
अपने ही भीतर,
आत्मसात सा कर लिया है,
क्यूंकि, अब,
ये मुझे नहीं जीते,
मैं इन्हें जीती हूँ
हाँ सच !
इन्हें ही तो ----
-------जी रही हूँ मैं 

वैसे, तुम कैसे हो ,------
कैसे आज इधर से आना हुआ
-----------बस यूँ ही सर्द दिनों में
खिली धुप सेंकने का मन हुआ ----
या बीते दिनों की जुम्बिश
तुम्हे इधर खीच लायी -----

कुछ बोलते क्यूँ नहीं,
देव !
क्या बात है ---
इतनी ख़ामोशी भी अच्छी नहीं,
जानते हो,
ऐसी ही एक खामोश रात
मेरा सब छीन ले गयी थी, मुझसे
जिसके बाद से मैं डरने लगी हु तनहाइयों से
अब मैं भी जानती हूँ, और तुम भी
की हो सकता है, तुम मुझे और कुछ दे भी दो
पर तन्हाई नहीं दे सकते

और हाँ,
सुनो, देव !
तुम्हारे जाने के बाद
एक तुम ही नहीं थे,
जिसने मुझसे मुंह मोड़ लिया था,
यहाँ सभी मुझसे खफा हो गये थे
क्या मेरे अपने और क्या मेरे जज्बात,
वो बात ही नहीं करते थे मुझसे
कुछ सुनना ही नहीं चाहते थे,
यहाँ तक की मेरा करुन क्रंदन भी  ,
रोना चाहू तो रोने नहीं देते
हसना चाहू तो वो हसने नहीं देते
जैसे चिढ़ा रहे हो मुझे,
      
मैंने भी रोना हसना सब छोड़ दिया
जीती रही शुन्य में
जागती रही बंद आँखों से ,
देखती रही
पाताल से भी गहरे गहरे
सपने,

और एक दिन
मैंने भी चासनी के धागों में,
तुम्हारी यादों को लपेट केर 
सहेज कर रख दिया सदा के लिए………   

क्यूंकि, अब, 
सहेज कर रखी हुई चीजे
ज्यादा सकूं देती है
जैसे तुम्हारी यादें ====

अमर ====

Thursday, January 17, 2013

“तिलिस्म”





मीलों लम्बे सफ़र
             मीलो लम्बे कारवां,
तलाशते जिंदगी
अनाड़ियों की तरह

पंखो की थकान
मन का भटकाव,
एक अंतहीन सफ़र
पानी के बुलबुलों की तरह

तेज बहती धारा
मंद –मंद बहती हवा,
सोते हुए लोग
भागते तेज बदलो की तरह

पैगाम एक दुसरे का
एक-दुसरे की जुबान पर,
अस्थिर जीवन फीकी रौशनी
यहाँ सब कुछ एक तिलिस्म की तरह

अमर ====


Tuesday, January 15, 2013

प्रेम की मौन भाषा


"एक तुम्हारे, 
 
कह देने भर से तो सब ख़त्म नहीं हो जाता 
एक तुम ही तो नहीं 
जिसने रिश्तों को जिया 
मैंने भी तो ,
तुम्हारे हर सुख-दुःख में,
तुम्हारा साथ दिया,
स्थितियां कैसी भी रही हों ,
कभी उफ़ तक न की,
तुम्हारे साथ बराबर की भागीदार बनी रही
हाँ सच सुना तुमने
"बराबर की भागीदार"
आज बराबरी की बात कह दी,
तो तुम इतना आँख भौं सिकोड़ रहे हो
तब तो कोई ऐतराज न था तुम्हे
जब मंत्र पढ़े गए थे हमारे दरमियाँ
तब तो हमने-तुमने मिलकर कसमें खायी थी
कैसी भी परिस्थति हो
रिश्तों को हम मिल जुलकर निभाएंगे
हम मिलकर सामना करेंगे
फिर आज ऐसा क्या हुआ,
जो तुम दूर जाने को विवश हो गए
शायद
तुम हार गए हों ?
उकता गए हो, मुझसे
या तुम्हारी पुरुष पाशविक प्रकर्ति जाग गयी है
या फिर दूर जाने का बहाना करके,
अपनी कायरता को छुपाना चाहते हो,

तुम भूल गए हो शायद,
की अब तुम्हारी जिंदगी सिर्फ तुम्हारी ही नहीं
मेरे भी जीने का एकमात्र सहारा है
फिर भी गर जाना ही चाहते हो
तो,
जाओ चले जाओ, जहा जाना हो तुम्हे
तुम मुझे, न चाहो, न सही
इसमें तुम्हारा दोष भी नहीं
और तुम्हे दोष देने से फायदा भी क्या
वैसे भी तुम इस "दम्भी पुरुष समाज" के,
बजबजाते हुए एक तुच्छ निमित्त मात्र हो
और
अगर मैं तुम पर दोषारोपण करती भी हूँ
तो ये मेरा, अपने उपर ही लगाया हुआ एक घिनौना इल्जाम होगा,
तुम तो कभी इतने समझदार थे ही नहीं
की प्रेम की मौन भाषा को समझ भी सको
फिर तुमसे क्या कहना
जाओ चले जाओ :(


अमर ====

Tuesday, January 8, 2013

प्रेम या भ्रम


              मै मान भी लूँ
            कि तुम्हे प्यार नहीं मुझसे
            जो भी था,
सब एक छलावा मात्र था
पर इसमें
मेरा तो कोई दोष नहीं
मैंने तो तुम्हे ही चाहा था
चुन लिया था तुम्ही को सदा के लिए

फिर इस बार भी
मै ही सजा क्यूँ भुगतूं 
      हे प्रभु 
तुम बार-बार मुझे ही
क्यूँ चुनते हों
अपनी भृगु दृष्टि के लियें

इसे तुम्हारा प्रेम समझूँ 
      या तुम्हारा उपकार

कैसे कैसे सपने बुने थे
मैंने रेशमी धागों से
तुमने कुछ न सोचा
पल भर में
तोड़ दियें सारें ख्वाब

ये भी न ख्याल आया
इन्ही रेशमी धागों से
बुनी है मेरी साँसों की डोर

तुम तो बस,
तोड़ कर चल दिए
सच !
क्या तुम्हे मुझसे प्यार नहीं
मुझे अब भी ये विश्वास नहीं

अमर====