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Tuesday, January 8, 2013

प्रेम या भ्रम


              मै मान भी लूँ
            कि तुम्हे प्यार नहीं मुझसे
            जो भी था,
सब एक छलावा मात्र था
पर इसमें
मेरा तो कोई दोष नहीं
मैंने तो तुम्हे ही चाहा था
चुन लिया था तुम्ही को सदा के लिए

फिर इस बार भी
मै ही सजा क्यूँ भुगतूं 
      हे प्रभु 
तुम बार-बार मुझे ही
क्यूँ चुनते हों
अपनी भृगु दृष्टि के लियें

इसे तुम्हारा प्रेम समझूँ 
      या तुम्हारा उपकार

कैसे कैसे सपने बुने थे
मैंने रेशमी धागों से
तुमने कुछ न सोचा
पल भर में
तोड़ दियें सारें ख्वाब

ये भी न ख्याल आया
इन्ही रेशमी धागों से
बुनी है मेरी साँसों की डोर

तुम तो बस,
तोड़ कर चल दिए
सच !
क्या तुम्हे मुझसे प्यार नहीं
मुझे अब भी ये विश्वास नहीं

अमर====

Thursday, December 13, 2012

मैं एक औरत हूँ


सच,
यही बात है न, की,
मैं एक औरत हूँ
बस यही कसूर है मेरा

बस इसीलिए
मेरा सच्चा स्वाभिमान
तुम्हारे झूठे अभिमान
के आगे न टिक सका

मुझे झुकना ही पड़ेगा
तुम्हारे
झूठे दंभ और अहंकार के आगे

सदियों से यही होता आया
सीता ने राम के लिए
तो
राधा ने श्याम के लिए
क्या कुछ न सहा

फिर मेरी क्या बिसात
तुम्हारे आगे,

फिर भी
हर बार,
बार-बार,
आना ही होगा
तुम्हारे आगोश में

यह जानकार भी
ये कुछ पल का चैन
जिंदगी भर का सकूं छीन लेगा

मैं एक औरत हूँ न
बस
झुकना ही होगा
कभी तुम्हारे तो कभी
तुम्हारे झूठे स्वाभिमान के आगे ----------

अमर=====
 

Thursday, November 22, 2012

भूली -बिसरी यादें





"मैं कोई किताब नहीं,
जिसे जब चाहोगे, पढ़ लोगे तुम
मैं कोई असरार नहीं,
जिसे जब चाहोगे, समझ लोगे तुम ,
मैं हु, तुम्हारे दिल की धड़कन,
जिसे सुनना भी चाहो, तो न सुन सकोगे तुम

कितना ही शोर, हो, तुम्हारे चारो तरफ
न सुन सकोगे तुम ,
कितनी ही उजास हो तुम्हारी रातें,
न सो सकोगे तुम,
पल भर में खीच लायेंगी,
तुम्हे हमारी यादें,
एक पल भी बगैर हमारे,
न रह सकोगे तुम,

मैं हूँ समेटे, अपने दिल में प्यार का दरिया, तुम्हारे लिए
किसी रोज लौटा, तो बहने से, खुद को, न रोक सकोगे तुम"

अमर====
 

Thursday, August 23, 2012

"मेरी बेटी-मेरा प्रतिबिम्ब"


"मेरी बेटी-मेरा प्रतिबिम्ब"

साँसें ठहरी रही,
मेरे सीने में
एक लम्बे अरसे तक,
जैसे,
एक तेज महक की घुटन ने,
मानो जिंदगी को जकड रक्खा हों,

मैंने भी ठान रक्खी थी जीने की,
और अपने आप को (मेरी बेटी) जिन्दा रखने की,

इसी जद्दोजहद में ...
मुझ पर हकीकतों के लबादे चढ़ते रहे,
और मेरे आँगन में अहिस्ता-अहिस्ता कस्तूरी महकती रही
ये बात और है की भूख के निरंतर दंश ने
उसे एक तेज़ सीली चुभन सा बना दिया था
क्योंकि भूख यक्ष सी होती है
और जिसका प्रतिकार लगभग असंभव सा होता है ,

आँख - मिचौली के इस खेल संग
मेरी कस्तूरी (मेरी बेटी) भी आज सोलह की खुशबू से महक उठी
मै एक बार फिर सहम उठी हूँ
वर्षों पहले के घटनाक्रम की पुनरावृत्ति के डर से
जब अपनों ने ही मनहूसियत के ठप्पे के साथ मुझे पराया कर दिया था
बेघर और बेसहारा भी .....,

क्या बेटी कोई गुनाह है ..
या फिर मै अकेली ही वजह हूँ इसकी ....
फिर सज़ा मुझे ही क्यों ....
इसके जवाब का उत्तरदायित्व एक बड़े प्रश्नचिन्ह के साथ
मैंने समाज को (आप सबको) सौंप दिया है ,

और आज मै ...एक औरत ..एक माँ ने
अपनी बेटी को सम्मान सहित विदा करने का हौसला भी दिखाया है ,

अब मै एक बार फिर अकेली हूँ
पर आज पूरे आत्मसम्मान और संतुष्टि से गौरवान्वित भी !!!
अमर====
 

Monday, August 6, 2012


हमारे रिश्ते, 
जैसे लोथड़े हो मांस के 
खून से सने, लथपथ....
बिखरे, 
सड़क किनारे ...
 
जिन्हें देखते, हम
अपनी ही बेबस आँखों से 
बहता हुआ......

वही कुछ दूर पे बैठा 
हाफंता,
इक शिकारी कुत्ता ,
जीभ को बाहर निकाले
तरसता भोग -विलासिता को .......

बचे है 
पिंजर मात्र,
हमारे रिश्तो के .......
जिनमे अब भी
कही-कहीं,
लटके  है 
हमारे विश्वास के लोथड़े .....

जिन्हें कुरेद कुरेद के नोचने को, 
बेताब,
बैठा कौवा 
कांव-कांव करता ,
इक सूखी डाली पर...... 

दिलो में अभी भी ज़मी गर्द 
जिन बेजान रिश्तो की, 
उन्हें भी ,   
चट कर जाना चाहता है,
दीमक,
अपनी कंदराओ के लिए 

कहाँ खो गए है 
हम इन रिश्तो के जंगल में 
जहा सब दिखावा है 
छुई-मुई सी है जिनकी दीवारें 
जो मुरझाती है अहसास मात्र 
छुवन से ही ....

कोई आये बीते दिनों से 
जहाँ, 
आज भी इक आवाज काफी है 
अंधेरो में उजाले के लिए 

दौड़ पड़ते है रिश्तो के 
बियाबान - घनेरे जंगल 
लेकर उम्मीदों की मशाले
कैसा भी हो मायूसी 
पल भर में ही हो जाता है उजाला 

ये कैसे रिश्ते है जो 
छूटते  भी नहीं और टूटते भी नहीं .........


अमर =====