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Wednesday, June 20, 2012


मेरी साँसों के स्पंदन 
तेज होने लगे है,
जब से,
चिर-परिचित कदमो की 
आहट सुनाई दी है 

वो आयेंगे न, 
या, ये  मेरे मन की मृग-मरीचिका है, 
मेरे कानो ने, सुनी है जो आहट
कही वो दूर से किसी का झूठा आश्वाशन तो नहीं 
कही मेरी प्रतीक्षा 
मेरा विश्वास
सब निराधार तो नहीं,.........

नहीं उन्हें आना ही होगा 
उन्हें मजबूर होना ही पड़ेगा
कृष्णा भी तो आये थे 
मथुरा से वृन्दावन
अपनी गोपियों से मिलने
मै भी तो उनकी रुक्मणी हूँ.......... 
मुझे उनके साथ ही रहना है 

वो आयेंगे जरुर आयेंगे, 
मेरा विश्वास, 
मेरी आराधना,   
यूँ ही व्यर्थ नहीं जाने देंगे वो, 
उन्हें भी अहसास होगा 
मेरे विरह की पीड़ा का, 
मेरे करुण क्रंदन का, 
कुछ तो मोल होगा 
उनकी निगाहों में, 
मेरे आंसुओ का...
उनके बहने से पहले 
वो मेरी बाँहों में होंगे  
मै उनकी पनाहों में.....

मेरी साँसों के स्पंदन 
तेज होने लगे है,
जब से,
चिर-परिचित कदमो की 
आहट सुनाई दी है,

====अमर===== 

Wednesday, June 6, 2012


दूर, बहुत दूर, 
मेरी यादों के झुरमुटों में 
झीने कपड़े से बंधा 
मेरी साँसों के सहारे 
तेरी यादों का वो गट्ठर,  
जिन्हें वक्त के दीमक ने 
अंदर ही अंदर खोखला 
कर दिया है,
बचा है जिसमे
सिर्फ और सिर्फ ,
मेरी अपने अकेले की साँसों का झीनापन 
जो शायद , किसी भी वक्त, 
निकल कर गठरी से 
तड़पने लगे ,

वही कुछ दूर पे ही 
बैठे है 
भूखे ,प्यासे, कुलबुलाते 
चील और गिद्ध , 
जो न जाने 
कब से इसी आस में है 
की कब मेरा बेजान होता जिस्म 'बेजान' हो 
और वो अपनी भूख मिटा सके......

निरंतर,
दिन प्रतिदिन 
खोखले होते बिम्ब, 
दिखने लगे है.... 
झीना कपडा भी हो रहा है जार-जार
फिर भी लोग आकर्षित होते है, 
मेरी ख्वाहिशे देखने को, ... 
न जाने क्यूँ ....
शायद, 
कैद करना चाहते हों, अपने-अपने कैमरो में 
सजाना चाहते है 
पेंटिंग्स की तरह, अपने घरो में  
इससे पहले शायद ही, उन्हें 
किसी के सपने 
ऐसे भरे बाजार तड़पते दिखे हों 
"तेरी यादों का वो गट्ठर" 

अमर*****

Tuesday, May 29, 2012

"भूल जाना मुझे सदा के लिए"

मै कोई कविता या रचना लिखकर आपके सम्मुख प्रस्तुत नहीं कर रहा हूँ , अपने आस पास की इक कडवी सच्चाई बयाना कर रहा हूँ 






१. 
अधूरी जिंदगी के,
तन्हा सफ़र में 
कल यु ही, 
याद आ गयी, 
"तुम्हारे साथ बीते 
उन अप्रतिम पलो की 
जो याद हैं मुझे,
कभी न भूलने के लिए 

"जैसे ,
हमारी वो,  पहली मुलाकात, 
बारिश की रिमझिम फुहारे
जिनमे बरसा था कभी 
तेरा-मेरा प्यार"

"पास आना तुम्हारा 
चुपके चुपके धीरे धीरे,
सबके सामने,
हौले  से कहना 
"मै प्यार करती हूँ तुमसे "
"मेरे नयनों के धारे मंद मंद मुस्कुराते बहने लगे "

२- 
मुझे याद है वो दिन भी 
वैसी ही गरजती रातें 
वैसी ही बरसती रातें 
तुम्हारा रूठ कर जाना 
घर से, 
और .......
दोबारा फिर न मिलना 
और मिलना भी तो कहाँ ?
जहाँ टूटते है रिश्ते पल भर में 
जहाँ रिश्ते बचाए नहीं जाते, 
सिर्फ तोड़े जाने के लिए बहस होती है
"अदालत",
वो ही लोग
वो ही गवाह 
वैसा ही लोगो का हुजूम, 
जो साक्षी थे 
कभी हमारे मिलन के, 
आज हमारे विरह  के साथी बनेंगे, 
और अंत में, 
"बस दो पल के लिए पास आना तेरा 
कहना भूल जाना मुझे सदा के लिए "
"मेरे नयनों के धारे मंद मंद हिचकिचाते बहने लगे "
जो शायद ही जल्दी रुके,
अमर*****




Monday, May 21, 2012


न जाने कैसे लोग बदल जाते है 
पर सच है, वक्त के साथ सब लोग बदल जाते है 

जो मेरे हमनशी, मेरे कह्कशी थे कभी  
अब तो उनके भी तरकश-ए-तीर बदल जाते है 

गम ये नहीं की, वो  मेरी साधना की प्रतिमा न बने 
गम  तो इस बात का है , 
कि अब तो उनके भी,
कभी शिव, तो कभी शिवालय बदल जाते है 

हर बार इल्जामात  का तमगा दिया उसने, मुझको, खुद बेवफा होकर 
मैंने देखा है, अब तो, उसके भी कभी दरिया, तो कभी साहिल बदल जाते है 

वो  मेरे रकीब, मेरे रहबर, मेरे खुदा बने थे कभी 
वो आज सिर्फ पत्थर का बने बुत नजर आते है 

गम नहीं इसका की भरी महफ़िल रुसवा किया उसने,   
गम इस बात का की वो ही तमाशाई नजर आते है ..

मेरे संबंधो की दी दुहाई उसने मेरे दायरे में आके, 
अब तो, हम जब भी मिलते है "मेरे- उनके रिश्ते बदल जाते है" 
अमर****

Monday, April 16, 2012

मेरी किताब के वो रुपहले पन्ने



ये कोई कविता नहीं सिर्फ मन के भाव है जो कल रात मेरी किताब में रखी इक पुरानी फोटो देख कर आये....प्रस्तुत है ****

मेरी किताब के वो रुपहले पन्ने" 
जो अनछुए ही रह गए
मेरे अब तक के जीवन में 
जिन्हें, पढने का समय ही नहीं मिला 
या यूँ कहे की 
जिंदगी की आप धापी में,
कही गुम से हो गए शायद  

न जाने कब से 
संभाल कर रखा है,
उन्हें मैंने, 
अपने दिल की अलमारियों में, 
अपनी ही साँसों की तरह, 

आज फिर से 
बंद अलमारियों से 
बुलाते है 'वो'  मुझे 
उन छुटे हुए किस्सों को 
समझाने के लिए, 
जो कभी छुट गए थे, मुझसे ,
खीचते है बरबस अपनी ओर 
मै भी खिचा चला जा रहा हूँ 
उसी तरफ 
शायद आज मुझे उनकी ज्यादा जरुरत है 
या उनके लिए मेरे अहसास जाग गए है 

उनका काफिया आज भी वही है  
जो बरसों पहले थे 
बस आज वो मेरे हिस्से के लगते है 
जो कभी पराये से लगे थे 
वो नहीं बदले, न बदली उनकी तासीर 
बदला तो केवल मेरा नजरियाँ 
"मेरी किताब के वो रुपहले पन्ने"

अमर''........