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Monday, May 21, 2012


न जाने कैसे लोग बदल जाते है 
पर सच है, वक्त के साथ सब लोग बदल जाते है 

जो मेरे हमनशी, मेरे कह्कशी थे कभी  
अब तो उनके भी तरकश-ए-तीर बदल जाते है 

गम ये नहीं की, वो  मेरी साधना की प्रतिमा न बने 
गम  तो इस बात का है , 
कि अब तो उनके भी,
कभी शिव, तो कभी शिवालय बदल जाते है 

हर बार इल्जामात  का तमगा दिया उसने, मुझको, खुद बेवफा होकर 
मैंने देखा है, अब तो, उसके भी कभी दरिया, तो कभी साहिल बदल जाते है 

वो  मेरे रकीब, मेरे रहबर, मेरे खुदा बने थे कभी 
वो आज सिर्फ पत्थर का बने बुत नजर आते है 

गम नहीं इसका की भरी महफ़िल रुसवा किया उसने,   
गम इस बात का की वो ही तमाशाई नजर आते है ..

मेरे संबंधो की दी दुहाई उसने मेरे दायरे में आके, 
अब तो, हम जब भी मिलते है "मेरे- उनके रिश्ते बदल जाते है" 
अमर****

Monday, April 16, 2012

मेरी किताब के वो रुपहले पन्ने



ये कोई कविता नहीं सिर्फ मन के भाव है जो कल रात मेरी किताब में रखी इक पुरानी फोटो देख कर आये....प्रस्तुत है ****

मेरी किताब के वो रुपहले पन्ने" 
जो अनछुए ही रह गए
मेरे अब तक के जीवन में 
जिन्हें, पढने का समय ही नहीं मिला 
या यूँ कहे की 
जिंदगी की आप धापी में,
कही गुम से हो गए शायद  

न जाने कब से 
संभाल कर रखा है,
उन्हें मैंने, 
अपने दिल की अलमारियों में, 
अपनी ही साँसों की तरह, 

आज फिर से 
बंद अलमारियों से 
बुलाते है 'वो'  मुझे 
उन छुटे हुए किस्सों को 
समझाने के लिए, 
जो कभी छुट गए थे, मुझसे ,
खीचते है बरबस अपनी ओर 
मै भी खिचा चला जा रहा हूँ 
उसी तरफ 
शायद आज मुझे उनकी ज्यादा जरुरत है 
या उनके लिए मेरे अहसास जाग गए है 

उनका काफिया आज भी वही है  
जो बरसों पहले थे 
बस आज वो मेरे हिस्से के लगते है 
जो कभी पराये से लगे थे 
वो नहीं बदले, न बदली उनकी तासीर 
बदला तो केवल मेरा नजरियाँ 
"मेरी किताब के वो रुपहले पन्ने"

अमर''........

Monday, April 2, 2012

"नगर वधु"


१-
नहीं आसरा,
मंजिल का अब, 
न किसी पड़ाव की जरुरत है मुझे 
जो भी रुका, मंजिल बना 
जो चला गया 
वो कुछ पल का रहबर बना 

२-
न मेरी कोई डगर है 
न मेरा कोई नगर है यहाँ 
जिस राह भी तुम ले चलो 
वो ही डगर अपनी 
जिस नगर  में तुम रुको 
वो ही नगर अपना है यहाँ 

३-
न यहाँ की  बस्ती मेरी 
न यहाँ के लोग मेरे 
जिसने जहाँ भी रखा मुझे 
उसी का घर मेरा घर बना 

"ऐ समाज के पुरोधा 
अब तुम ही बताओ, 
मै क्या हूँ ????"

अमर*****     
नगर वधु- तवायफ़ 

Saturday, March 24, 2012

सच्चा प्रेम ?



आज वो बात कहाँ, वो लोग कहाँ
उनसे हुई वो, पहली मुलाकात कहाँ ?

बचे है तो सिर्फ, कागज पे लिखे बोल प्यार के ,
प्यार करने वाले, वो लोग अब बचे है कहाँ ?

ये नसीब की बात नहीं, ये अमावस की रात नहीं
ये तो इक खामोशी है , इसको सुनने वाले अब मिलेंगे कहाँ ?

वो लरजते हांथो से लिखे महकते ख़त कहाँ
बचे है अब प्यार की बारिश में खिलने वाले वो फूल भी कहाँ ?

रिसते जख्मो से बहे लहू का अब रंग लाल है कहाँ
मिले थे जिस प्रेम से कन्हैया अपने सुदामा से, वो प्रेम भी अब बचा है कहाँ ?
'अमर' 

Monday, March 19, 2012

तो डर लगा !


कल रात
हुई 
जोर की बारिश 
बाद, तुम्हारे जाने के, 
तो डर लगा !

आज घर  
में
फिर, चूल्हा न जला 
गीली लकड़ियों से 
तो डर लगा !

वो भूखे बैठे,
पेट पकडे 
कुलबुलाते नंगे 
मेरे बच्चे,  
तो डर लगा !

तुम्हारे आने की आहट
सुनी, कई बार मैंने 
मगर 
तुम न आये 
तो डर लगा !

सांझ ढले 
सबसे छिपते छिपाते 
मै बेचने निकली 
तुम्हारे घर की इज्जत 
तो डर लगा !
अमर ****