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Thursday, January 12, 2012

तुम तक आने का रास्ता


बुझने  से  पहले,   
मेरी  आखिरी  लौ  को 
इक रात, तुमने ही तो
अपने हथेलियों की गुफाओ में  छुपाया था  मुझे,  
"उसी दिन मै बस गयी थी तुम्हारे हाथो की लकीरों में 
पर आज भी नहीं ढूँढ पायी 
उन लकीरों से होकर तुम तक आने का रास्ता" 

उस  रात शायद  तुम्हे  
जरूरत  थी  मेरी  रौशनी  की  
कुछ  अँधेरा  सा  था  घर में तुम्हारे .........
तुम  कुछ  सकुचाये -सकुचाये से  
कुछ  घबराये  से  थे  
तब  मै  साथ  थी  तुम्हारे 
रोशन कर    गयी थी    तुम्हारे हा तुम्हारे  घर  को  
अपनी  ही  रौशनी  से , 
दूर  कर  दी  थी  तुम्हारी  उस  रात  की  उलझन  
अपने  निश्चल प्रेम के प्रकाश पुंज  से  
जगमगा  उठे  थे  जिसकी रौशनी में तुम,  

मेरी चाहत थी  तुम्हे संग अपने जगमगाने की 
न छोड़ने  की उन अँधेरी कंदराओ में तुम्हे , 
जहा दर्द से सीले अँधेरे  खीचते है अपनी ओर,
जहा जाने के बाद लौट आना सपनो सी बात, 
थी मै इक नन्ही शमा, इरादे फौलाद से मेरे, 
और  मेरा  वही  कोना  
जहा  मै  जलती  रही  अपनी  उम्र  भर , 
निहारती  रही  
सिर्फ  तुम्हे , सिर्फ  तुम्हे , क्योकि 
"बुझने  से  पहले,   
मेरी  आखिरी  लौ  को 
इक रात, तुमने ही तो
अपने हथेलियों की गुफाओ में  छुपाया था  मुझे "

अटूट प्रेम से निहारा  था 
कभी, तुमने  मुझे 
अँधेरी रातों में,  
कितनी ही देर तक, 
मुझे वो पल भुलाये नहीं भूलते 
वो इक - इक पल तुम्हारे संग बिताये हुए 
मुझे अब भी याद  है जब तुम .............

फिर  एक  दिन...........
जो मेरे जीवन का अंतिम दिन था ,
तुम्हे  लगा  होगा  
अब  ख़त्म  होने  वाली  है  
तुम्हारे  जीवन  में  प्रकाश  फ़ैलाने  वाली मेरी रौशनी  
या मेरी  रौशनी में  अब वो चमक नहीं रही
जो तुम्हे आकर्षित कर सके, 
रास्ता दिखा सके तुम्हे घने अंधेरो में 
जिसे तुमने ही बचाया था इक रोज............  
मेरी  लौ 
मेरी  अंतिम कापती लौ  से  पहले  
तुम्हे करना था  कुछ  इन्तजाम ,
ये ही सोच कर 
तुमने अपलक निहारा मुझे  ,
सोचकर, जब  ये  न  होगी,  
तो  कैसे  रोशन  होगा  तुम्हारा  जीवन, 
मै  कुछ  पल  और  जलती  
या  शायद  कुछ  पल  और .............
पर तुम्हारी अतृप्त अभिलाषाओ ने 
तुम्हे मजबूर किया होगा ,
मुझे मिटाने के लिए 
या शायद मेरी रौशनी फीकी पड़ गयी होगी, 
तुम्हारे विश्वास के आगे   
कुछ कापी सी होगी, मेरी लौ 
या कुछ तेज सी हो गयी होगी 
अपने अंतिम पहर से पहले 
और  तुमने डर के  अँधेरे से 
इक नयी शमा जलाई  होगी
ख़त्म कर दिया  मेरा अस्तित्व 
फिर उसी तरह , उसी जगह 
इक दूसरी शमा जलाकर 
जैसे तुमने मुझे जलाया था............ 
बुझ गयी मै, सब कुछ सहे  
बिन कुछ कहे, 
ये ही मेरी आखिरी इच्छा थी 
अपने अंतिम समय तक तुम्हे रोशन करने की 
तुम्हे उदीयमान देखने की हमेशा हमेशा , क्योकि 
"बुझने  से  पहले,   
मेरी  आखिरी  लौ  को 
इक रात, तुमने ही तो
अपने हथेलियों की गुफाओ में  छुपाया था  मुझे"  
उसी दिन मै बस गयी थी तुम्हारे हाथो की लकीरों में 
पर आज भी नहीं ढूँढ पायी 
उन लकीरों से होकर तुम तक आने का रास्ता  "

Wednesday, December 21, 2011

"सिसकते लम्हे"


न अब यहाँ रुकने का मन 
न किसी को रोकने का,
न किसी के आने का सबब
न अब किसी के जाने का, 
बस 
सारी रात, 
तन्हा, बरस जाने का मन 
घुप्प अंधेरो में,
अपनी ही परछाई से, 
सिसकते हुए लिपट जाने का मन 

NA AB YAHA RUKNE KA MAN 
NA KISI KO ROKNE KA 
NA KISI KE ANE KA SBAB
NA KISI KE JANE KA SBAB
BAS,
SARI RAT,
TANHA, BARAS JANE KA MAN 
GHUPP ANDHERO ME,
APNI HI PERCHAYI SE, 
SISAKTE HUE LIPAT JANE KA MAN  

Friday, December 9, 2011

मै इक बंधा ''शिकारा''



न तुम, मेरे करीब आ सकी 
न मै, तुमसे दूर जा सका 
उम्र बीतती रही ऐसे ही ख्यालो में 
 कभी तुम कुछ नहीं बोले 
 न कभी हमसे कुछ बोला  गया,

कभी तुम मुझसे छुपाते गए 
कभी मुझसे दिखावा न हुआ 
न जाने वो कैसा रास्ता था 
जिसपे कभी तुम नहीं चले 
और न कभी मुझसे अकेले आया गया 

 
तुम रहे इक आजाद पंछी 
मै इक बंधा ''शिकारा''
तुमने रुकना मुनासिब नहीं समझा 
 न कभी मुझसे तुम्हे रोका ही गया 

तुम्हे नए रिश्ते बनाने का शौक
हमे पुराने बंधन प्यारे 
तुमसे कभी बन्धनों में बंधा न गया 
और न हमसे नये साहिलों से  रिश्ता बनाया गया

Friday, November 25, 2011

****और लौ फिर बुझ गयी ****


खंडहर, 
मेरी यादों के
जहा बसते है मेरे,
सपने 
जो अब बचे है सिर्फ 
फड़फड़ाते  हुए ...
जिनके पंखो में 
अब नहीं  है 
उड़ने की शक्ति,
हो  गए  है 
निमित्त मात्र, 
फिर भी कभी -कभी   
करते है,
कोशिश 
आखिरी उड़ान  की 
शायद  उन्हें याद आ जाती है 
उसी बुझते हुए  दीपक की 
आखिरी लौ

देखकर लगन उसकी 
लगता है की अगले ही पल 
शायद पूरे हो जायेंगे 
सब सपने मेरे 

जो अब तक खंडहर में छुपे फिरते थे 
वो आ जायेंगे खुल के सबके सामने, 
फिर अगले ही पल 
पता चलता है की 
बस इतना ही तेल था 
जलाने को , दीपक में 
और लौ फिर बुझ गयी 

फिर से वही अँधेरा 
फिर से वही खंडहर
जहा मेरे सपने अब भी  है 
इसी आस में 
की शायद कोई आये , उन्हें पूरा करने *******

Thursday, November 3, 2011

"मंजिल की तलाश में"


मेरी  मंजिल!!
न ये जिंदगी है ....
न ये आसमां........, 
हर सुबह दौड़ता हूँ 
फिर भी मंजिल की तलाश में !!!!!!!!

कोई पुकारे मुझको,
मेरे अतीत से 
तो कोई सामने  से
मुझको आवाज दे , 
गंतव्य है मेरा कहाँ , नहीं जानता 
बस दौड़ता जाता हूँ ,  बेकस ,बेबस , बेसबब
मंजिल की तलाश में !!!!!!!!

मै बन गया हु,
इक रेल का डिब्बा,
है कौन सा स्टेशन , मेरा अंतिम पड़ाव 
नहीं जानता, 
रुकता हूँ कुछ घडी , कुछ पल 
फिर अगले ही पल 
आती है इक आवाज ssssssss
बदल देती है जो मेरी पहचान के मायने 
मै फिर दौड़ने लगता हूँ 
मंजिलो की तलाश में !!!!!!!

यहाँ है सबके अपने अपने उसूल
सबके अपने अपने दायरे 
कुछ घडी तो,
साथ चले हमसफ़र बनके 
फिर अगले ही स्टेशन पर
उतर पड़े अजनबी बनके, 
मै फिर दौड़ने लगता हूँ 
मंजिल की तलाश में !!!!!!!

                                             अमरेन्द्र शुक्ल 'अमर'