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Saturday, August 6, 2011

ये अधूरी जिंदगी



मेरी अधूरी जिंदगी  
जो मेरे मन की टूटी हुई खिड़कियों  के
सीखचों से बाहर झाकती, 
आजाद हो जाने को
कही दूर चले जाने को , 
जिसे कैद कर रखा हैं  
मैंने अपने ही अंदर 
घुप्प अंधेरो में,  
जहाँ घुट रही है 
अंदर ही अंदर ,
बेहद निरास, बेहद हतास 
मेरी जिंदगी,

मै करवटे तो बदल  रहा हूँ 
पर खुद की  
जद्दोजहद की,  
जो खुद अपने आप से हैं
जहा लड़ रही है
मेरी जिंदगी ; 
कभी न बदलने वाले उसूलो से 

यहाँ बर्फीली तेज हवाये 
जला रही है मुझे 
दावानल के जैसे, 
जबकी  मेरी जिंदगी 
झांक रही है, छटपटा रही है
मेरे मन की टूटी हुई खिडकियों के सीखचों से बाहर
कही दूर जाने के लिए, 
मेरी जिंदगी 


जी रहा हूँ फिर भी 
मै ये अधूरी जिंदगी 

                               अमरेन्द्र ' अमर '

Thursday, July 28, 2011

इक बूँद

















दूर  ही  सही 
फिर भी, 
मेरे अपने  से लगते हो 
दूर  बादल  में,
छुपी इक बूँद जैसे   

बरसेगा सावन 
तो मेरे घर भी बरसेगा 
मेरे मन कि दिवारों  को 
भिगोते हुए  से 

दरार सी आ गयी है 
मेरे दर-ओ-दीवार में , 
तू बरसेगा कितना भी,
चुपके चुपके
रिस रिस के 
वो एक बूँद
पहुच ही जाएगी 
भिगोने के लिए 


कब से रेतीले रेगिस्तान में खड़े है 
ठूठ के जैसे 
बरसों तो शायद ,
कुछ फूल खिल जाये मेरी अभिलाषाओ के 

तू  कब का बरस गया होता 
जो हमसे दूर न गया होता 
एक हम है जो दूर तो हो गए 
बरसा न गया हमसे 

इस तन्हाई -ए- आलम में 
साथ रहा है मेरे 
तो वो है मेरी तन्हाई 
उसकी तन्हाई ने तो कब का 
भिगो दिया होता 

वो दूर से ही कहता रहा 
अपना ख्याल रखना 
मैंने भी  रखा 
वैसे ही 
जैसे 
सागर किनारे 
नन्हे करतलो  से बने  
रेत के छोटे छोटे महलो ने रखा ,
जो लहर आने का इन्तेजार तो करते है 
पर उनके जाने के बाद 
उन महलो का निशा तक नहीं होता 
वो आत्मसात हो जाते है उन्ही के साथ
उन्ही के संग 
अपने वजूद को मिटा के 

दूर  ही  सही 
फिर भी, 
मेरे अपने  से लगते हो 
दूर  बादल  में,
छुपी इक बूँद जैसे   


Thursday, July 21, 2011

चैन आ जाये



बहुत  दिन  बीते  ख्वाबो में मिले 
अब हकीकत  में आ जाओ तो चैन आ जाये

नजरे मेरी, कब से तुझे आईने में निहारे 
अब खुद मुख़ातिब हो जाओ तो चैन आ जाये

कब के टूटे अरमान मेरे, जुड़ते ही नहीं 
खुद टूट के  आ जाओ तो चैन आ जाये

मुहाने खड़े रहे समुंदर के, तो क्या हासिल 
तुम बूँद बन के आओ तो चैन आ जाये 

जैसे गीत गया हो पत्थरों ने, खुदा बनके 
ऐसे ही कोई गीत सुना जाओ तो चैन आ जाये 

मै पर्दा नशीं हो जाऊ, इस दुनियां जहाँ से  
ऐसे कभी पर्दा हटाओ तो  चैन आ जाये 

अरसा गुजर गया चाँद की चांदनी देखे
खुद चांद बन के आओ तो चैन आ जाये 

Thursday, June 30, 2011

तुमसा बागबां



वो लबो पे मेरा नाम जो लाते   
तो हम दौड़े चले आते थे ,
आज हमने पुकारा  
तो वो कहते है 
तुम्हारे दामन में कई कांटे है 
मैंने  कहा
जिसे मिल जाये, तुमसा बागबां
उसके दामन में कांटे भी फूल बन जाते है 

ये नसीब मेरा है जो कांटे है मेरे दामन में 
फूल होते तो कब का टूट गए होते 

बड़ी शिद्दत से सींचा है 
इनको मैंने 
खुशियों कि चाह में 
ये बने है फूल 
आज तुम्हारी राह में

फूल तो बहुत तोड़े होंगे तुमने  
कभी कांटे भी तोड़ के देखो 
यूँ तो फूलो कि कोमलता से भी 
तुम सहम गयी होगी
आज काँटों की  नर्मी भी देखो 

झुक रही थी वादियाँ कल तक इशारो पे मेरे 
आज पलके भी झुकती नहीं    
कल तक साथ थे, मेरे साये की तरह 
आज परछाई भी बनते नहीं 

कल तक मेरे दामन में  उनके प्यार की बारिश थी 
आज तन्हाई के  बादल है जो बरसते नहीं..........

Thursday, June 23, 2011

पिये जा, जिये जा



पिये  जा, जिये  जा ,
उसके अश्को को ही सही   
पर तू पिये जा जिये जा 
कल तक कमी थी 
आज पूरी हो जाएगी 
तेरे साथ न सही 
संग यादो में दौड़ी चली आएगी 

यहाँ मय भी है 
मीना भी है 
यादों में उसकी 
जीना भी है 

उतार इक घूंट, 
उसकी यादों का
तू हलक के नीचे  
यहाँ नशेमन भी है
और नशा -ए-यार भी 

रख सामने साकी, 
तू देख तो जरा 
नशा किस्मे है 
यहाँ तेरा हमदर्द (मय)  भी हैं
और तेरा यार भी 

पैमाने टूटते है 
तो टूट जाने  दो
आज हौसला रखो अपने हौसले का  
देख वफ़ा  किस्मे है 
आज वो भी है 
और उनकी यादे भी