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Thursday, February 3, 2011

"गुनाहगार"

फांसले  भी मिट गए 
दूरियां भी न रही,
वो लकीर ही न मिटी 
जो तुम खींच के गए,

पास भी आते गए 
दूर भी जाते गए , 
नजदीकियां भी रही, दरमियाँ
और वो दूरियां भी बढ़ाते गए,

हम सहरा - ए - मुहब्बत में ,
कुछ ऐसे उतरते  गए,
सरे बाज़ार रुसवा हुए
मोहब्बत - ए - झील में 
और वो खड़े देखते गए ,
 
"इस फरेबी दुनिया में ऐसा कई बार हुआ , 
गुनाहगार कोई और था, गुनाहगार कोई और हुआ "

Thursday, January 13, 2011

"मेरे जीवन साथी"


हों तुम क्या मेरे लिए 
कैसे बताऊँ, 
मै तुमसे अब कैसे छुपाऊ
कुछ मैं आधा  अधुरा  हूँ  
कुछ तुम पूरी - पूरी है,
फिर मै कैसे कहू की 
ये तुम हो !
ये मै हूँ !
जब की हम एक है 

गिर रही है बिजली
सागर में दूर कही,
उठ रही है तरंगे
मेरे मन में यहीं कही,
छा रहा है आँखों में नशा
तेरे खुमार का, 
फिर मै  कैसे कह दूँ 
ये तुम हो !
ये मै हूँ !
जब की हम एक है 

तुम बदले तो क्या बदले
पर्वतों  के  भी रंग
बदल गए,
पंछी ठहरे रात को 
और दिन में मचल गए,
फिर मै कैसे कह दूँ  की 
ये तुम हो
ये मै हूँ 
जब की हम एक है 

गंगा -जल  
मैला नहीं है आज भी, 
न जाने कितनो ने,
इसमें डुबकी लगायी
वो तो तारनहार  है,
तारेगी,  
मेरे इस जीवन को ,
तुम तो सदियों से मेरी हों
जन्मो - जन्मो को तारोगी  
फिर मै कैसे कह दूँ 
की ये तुम हो 
यें में हूँ
जब की हम एक है 

"मेरे जीवन साथी"

Saturday, December 11, 2010

सुन ! ऐ जिंदगी


सुन ! ऐ जिंदगी 
मै तुमको  बताना चाहता हूँ 
छोड़ दे तू साथ मेरा
मै तुझसे दूर जाना चाहता हूँ  

देख लिया तेरे साथ चलकर
तन्हा चलता आया हूँ
कोई भी तो साथ न आया 
भीड़ में जलता  आया हूँ

जब से जाना है 
तन्हाई के आलम को 
उसके हर रूप का दीवाना हूँ 
तू तो न बना पाया अपना मुझको 
मै उसका कल से दीवाना हूँ

तेरा जहाँ -ए - दस्तूर 
तुझको मुबारक,
जहाँ हर कदम पे 
धोखा  है  
कहने को तो हर कोई साथ है 
पर हर पल आदमी अकेला है 

सुन ! ऐ जिंदगी 
मै तुमको बताना चाहता हूँ
साथ तो तुम भी चले थे 
अब मै तुझे साथ का मतलब बताना चाहता हूँ 

जैसे उड़े पतंग डोर क संग 
जैसे रहे बिरहन यादो के संग 
जैसे लगे नयन 
सपनो के संग 
वैसे ही  रहे तन्हाई अब मेरे संग, 

सुन ! ऐ जिंदगी 
मै तुमको  बताना चाहता हूँ 
छोड़ दे तू साथ मेरा
मै तुझसे दूर जाना चाहता हूँ  

Saturday, December 4, 2010

मजबूत प्रतिद्वंदी

जब भी मन होता है 
तुमसे मिलने का 
उसी पेड़ की छाव में 
आ जाता हूँ, 

पछी घोसले नहीं बनाते
अब इस पेड़ पर 
तो क्या हुआ 
छाव में बैठते तो है ,

ये आज भी ,
उन हठीले तुफानो का सबसे मजबूत प्रतिद्वंदी है 
जिसमे न जाने कितने घर उजड़  गए   
और ये  खड़ा देखता रहा ,
 
"बस रिश्ते कमजोर पड़ गए 
जो इसकी छाव में बने"  

Friday, November 26, 2010

फरेबी


"अंधेरो  में  
रास्ते  दिखते  है यहाँ,  
दिन  के  उजाले  करते  है  
बगावत,  
रातो  को 
जुगनू  अपनी  चमक  
बिखेरता  है,  
सुबह  का  सूरज  
घना  अँधेरा  है  "

"जहा तक  भी  देखूँ
कुछ  दिखता  नहीं ,
बंद  कर  लू  
जो  आँखे  
तो फिर वही  तेरा
फरेबी  चेहरा  है "

"राहों में आकर तेरी 
राहों में नहीं थे ,
इक तुम थे  
जो मेरे मन मंदिर में होकर भी,
मेरे नहीं थे "