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Wednesday, November 25, 2009

मेरा नसीब

जो चाहा कभी न मिला मुझे 
कुछ ऐसी तकदीर पायी है 
जो देखे सपने हमने 
वो कभी न सच हुए ,
कुछ ऐसी तक़दीर पायी है 
जो ख्वाब बुना इन आँखों ने 
वो ख्वाब ही रह गए 
कुछ ऐसी तक़दीर पायी है 
जब भी संभलना चाहा
त्यों ही डगमगाए कदम 
कुछ ऐसी तक़दीर पायी है 
जाने कैसे लोग तुफानो के झंझावातों में डटे रहे 
मेरी कश्ती तो हलकी  सी लहर में भी भर आयी है 
न जाने क्यू ..................................................

Saturday, November 7, 2009

बिन मौसम बरसात


आज उनसे मिलने की ऋतू आयी है 
न जाने कितने बरसातो के गुजर जाने के बाद ,

वो आये , मिले तो भी बरसात है मेरे लिए
वो मिले और चले जाये तो भी बरसात है मेरे लिए ,

बरसात का मौसम मुझे कुछ यु भाया है
बिन मौसम ही मुझे भिगाया है ,

आज भी कुछ ऐसा ही आलम है
ऋतू है मिलन की और बेला है बारिश की ,

समझ में आता नहीं की ये बारिश क्यू है
उनसे मिलने की खुशी है  या उनसे फिर बिछड़ने का गम ,

बिन मौसम की बारिश से अब डर सा लगने लगा है ,
कही बह न जाऊ इस बारिश में,
ये लगने लगा है ,

आज फिर उनसे मिलने की ऋतू आयी है
थोडी ही सही इसी बहाने बारिश तो आयी है,

कई दिनों से पड़ा था सुखा इस झील में
आज फिर एक नयी लहर आयी है............




Monday, October 26, 2009

आँखों में सैलाब

वो रात ही ऐसी  थी ,
वो बात ही ऐसी थी
अश्क उसकी आँख में भी थे ,
अश्क मेरी आँख में भी थे ,
समुंदर सा सैलाब था हमारी आँखों  में ,
निकलने को बेताब ,
रोक रखा था किसी तरह हमने अपनी पलकों के बांधो से,
फिर भी वो बेताब था उन्हें तोड़कर बह जाने को ,
न चाहते हुए भी हम अश्को को बहने देना चाहते थे ,
अकेले में सारे बांध खुद तोड़ देना चाहते थे ,
रात भेर बैठे रहे आँखों में आँखे डालकर ,
हम बिन कहे ही सब कुछ कह गए ,
बना के आँखों को अपने लफ्जो का सहारा
सीधे उन के दिल में सब कुछ कह गए ....

हम रात भर बैठे रहे ....
कभी कुछ तो कभी कुछ सोचते रहे
सुबह को हम जिस मोड़ पे मिले थे कभी
उसी मोड पे हंसते हंसते  अलविदा कह गए .....
अश्क उसकी आँख में भी थे ,
अश्क मेरी आँख में भी थे ,

Saturday, October 24, 2009

वो मेरी समझ

वो साहिल, साहिल न था जिन्हें हम साहिल समझे ,
वो भवर से भी ज्यादा गहरा था ,

वो कली, कली न थी जिन्हें हम कली समझे ,
वो कांटे से भी कटीली थी ,

वो कश्ती कश्ती न थी जिन्हें हम कश्ती समझे ,
वो कश्ती कागज की कश्ती से भी नाजुक निकली ,

वो सफ़र,सफ़र न था जिस पे हम हमसफ़र खोजने निकले ,
वो सफ़र मेरा अंतिम सफ़र निकला ,

ऐसे ही लोग आते रहे !!!!!!!!! मिलते रहे !!!!!! और जाते रहे !!!!
ऐसे ही हर बार मुझे समझाते रहे ,

मै समझता रहा उन्हें कुछ और
वो कुछ और ही समझाते रहे ,,,,,,,,,,

Wednesday, October 21, 2009

मन की चंचलता

वो चंचल हवाये,
वो काली घटाए,
वो नीला आसमान,
वो सतरंगी जहाँ ,
हर्साता है मेरे मन को ,

जब कभी खो जाता है मेरा मन ,
वो वापस बुलाता  है मुझको ,

वो महकी बगिया ,
वो महका चमन ,
वो खिली कलिया,
वो खिला बदन ,

जब भी निराश होता हूँ ,
समझाते है मुझको ,

की खोकर अपना सबकुछ हम देते है खुशिया जहा को
बिना कुछ लिए ,
तब फिर तू  इतना  निराश है क्यू
जब की तू पा चूका है सब कुछ ,
अपनी चंचलता में जियो ,
न हो उदास , न होने दो किसी को , 
मेरे मन की चंचलता !!!!!!!!!!!